ग़ज़ल
ज़िन्दगी जैसी है क्या वैसी रहेगी।
तीरग़ी जैसी है क्या वैसी रहेगी।
भूख जाये देह के भूगोल तक,
तिश्नगी जैसी है क्या वैसी रहेगी।
आइने भी बोलते हैं झूठ अब,
ये सदी जैसी है क्या वैसी रहेगी।
ढ़ोना होगा बोझ जिम्मेदारियों का,
यातना जैसी है क्या वैसी रहेगी।
उनके चेहरे बंट गए चेहरों में अब,
फितरतें जैसी हैं क्या वैसी रहेंगी।
वो इरादे ले लड़ेगा ज़िन्दगी से,
जीत जैसी है क्या वैसी रहेगी।
पत्थरों से छू कर जो गुज़री फ़क़त,
ये हवा जैसी है क्या वैसी रहेगी
— वाई.वेद प्रकाश
