दोहे
अपनी पगड़ी बेचकर, ले आये सामान।
स्वार्थ के बाजार में , गिर गया यूं इंसान
मौन हुई पगडंडियां और खेत खलिहान ।
कृषि छोड़ मजदूर हुआ जब से यहां किसान।।
कदमों में नित जोश हो ,कभी न टूटे आस ।
स्वेद कणों की गंध का, जिसको हो विश्वास ।।
मुख के बाहर फूल हैं , या फिर भीतर खार ।
भाषा के व्यवहार से, पता चले संस्कार ।।
अपनी अपनी धूप है , अपनी अपनी छांव ।
सबके अपने सफर हैं , सबके अपने ठांव ।।
सौहार्द की गलबहियां, प्यार धुलाता पांव ।
नहीं रही वो हस्तियां ,नहीं रहे वो गांव ।।
अपनी देह निचोड़ कर ,बुत को दे आकार।
धरती के हर जीव पर, मां का यह उपकार ।।
लोरी मां की गोद की ,थपकी और दुलार ।
इस अनुपम उपहार का, ऋणी रहे संसार ।।
— अशोक दर्द
