रसोई में महफ़िल सजी
“अरे…अरे, तरबूज भाई थोडा उधर हो जाओ। ” अंगुर ने धीरे से कहा।
” अरे जा, मैं आराम से बैठा हूँ।”
अंगूर बेचारा क्या करता। यह दीदी ने और लीची ठूँस दी। लेकिन टैबू टस से मस न हुआ।
“लगता है, मनुज के साथ रहकर ये भी अहंकारी हो गया हैं।”
“जाने दो, आ जाओ, हम एक दूसरे के सहयोगी बने रहें।” अंगूर ने लीची को समझाया।
दही में बिलौना कर रही थी गुडिया, “कितनी छाँस गिर रही है। रोटी आधी झूठी छोडी है बिट्टू ने। कदर नहीं हैं अनाज की।” पतीले ने चम्मच से कहा।
सिंक की सांस घूंट रही थी। ओफ्फो, कितना भार।
“सफाई का जरा भी ध्यान नहीं रखते। पेस्ट कंट्रोल करते रहेंगे। मेरी तो हालत खराब हो जाती है बदबू से।”
बासी रोटी और चावल ने सबको शांत कराया। ” आओ, भूल जाते हैं सारे टेंशन। संगीत की महफिल सजाते हैं।”
खुशी से आपसी टकराव भूल सब सुर में सुर मिला कर थिरकने लगे।
रसोई में महफ़िल सजी।
