दिलीप अंकल को श्रद्धांजलि
अडिग, अचल, अटल जो पर्वत,
संघर्षों में भी अडिग रहा।
वह कैलाश था, वह दिलीप था,
हर दुख में जो संबल रहा।
ज्ञान की जोत जलाने वाला,
नेत्रों में उजियारा भर गया।
रक्त की हर बूंद दान कर,
नवजीवन को संवार गया।
ममता की छाया बने वो,
पिता भी थे, माता भी थे।
बेटी के हर आँसू में,
हौसले की बाती भी थे।
निर्धनों की आशा बने,
बचपन को संबल दे गए।
कैलाश सा ऊँचा जीवन जीकर,
अमरत्व का दीप जला गए।
शब्दों की तलवार उठाई,
लेखनी से मशाल जलाई।
ज्ञान-विज्ञान का जो था ज्ञान,
विविध भारती में गूंजा नाम।
कभी किताबों में रौशनी बनकर,
कभी शब्दों में प्रेरणा बनकर।
हर नन्हें मन की आस बना,
हर पीड़ित की आवाज़ बना।
आज गया तो बस काया गई,
यादों में उसकी माया रही।
हर दिल में अब भी हंसते है,
दिलीप अंकल, यादों में बसते है।
“ॐ शांति।”
— मीनाक्षी विनोद गौतम
रावतभाटा राजस्थान
