नकली नोट नकली सोच
हां हम भी खेले थे बचपन में
नकली मनोरंजन बैंक वाले नोटों से,
उछलकूद,धमाचौकड़ी,बाजारी लेनदेन,
बड़े बने रहते उम्र के छोटों से,
बच्चे आज भी खेल रहे
गांवों में अनवरत इसी तरीके,
सब वैसे ही आदान प्रदान नियम,सलीके,
जैसे जैसे बड़े होते गए
छोड़ दिए बचपन के नोटों वाला खेल,
काम का बोझ,दुनियादारी
झेल रहे वक्त का रेलमपेल,
मगर आज के बच्चे सामाजिक स्तर पर
बड़े पैमाने पर खेल रहे खेल वहीं,
नकली रहनुमाओं के पीछे
पागलों की तरह चलना बता रहे सही,
लेकिन कब तक भागोगे
बिना कुछ सोचे उन्मादी होकर,
क्या उचित है तोड़फोड़,हिंसा,
ले मुकदमें अपना भविष्य खोकर,
जागो युवाओं अतिशीघ्र जागो,
नकली चीज,नकली नोट,
नकली व्यक्ति के पीछे आंख मूंद मत भागो,
नहीं हो अब छोटे बच्चे,
उम्र के कच्चे,
अपना भविष्य कहां सुरक्षित है सोचो,
गलत के साथ होकर
अपने घर परिवार की आशाएं मत नोचो।
— राजेन्द्र लाहिरी
