कविता

एलेक्सा

हाँ वह एलेक्सा है,
आज की नहीं
बल्कि वह तो वर्षों से है।
वह एलेक्सा पैदा नहीं हुई थी,
माँ की मुनिया,
बापू की दुलारी,
विदा हुई जब इस घर से,
तब पैदा हुई एलेक्सा।
और फिर वही बनी रही,
उसको किसी मशीन में नहीं
बल्कि मशीन ही बना दिया
और
वह एक जगह नहीं
जगह जगह दौड़ती रहती है।
एक नहीं कई थे आदेश देने वाले,
वह रोबोट नहीं थी,
वह आज की तरह न थी
तब उसका नाम कुछ भी होता था।
उसे लाया जाता साधिकार,
फिर वह एलेक्सा बना दी गई।
तारीफ देखिए सदियों बाद जब
नयी एलेक्सा आई तो
वह भी स्त्रीलिंग है
और उसका निर्माता पुरुष।
आज की एलेक्सा तो बगावत भी कर सकती है,
कल की तो बोलना भी नहीं जानती थी,
चुपचाप आदेश पूरा करती रहती।
आज भी हर दूसरे घर में
दो दो एलेक्सा मिल जायेंगी
ये उनकी नियति है,
चाहे हाड़-माँस की हो या मशीन
उसे सिर्फ आदेश मानना है
बगैर नानुकुर किए
ये एलेक्सा हर युग में रही है
और रहेगी।
नारी का दूसरा अवतार एलेक्सा है।

— रेखा श्रीवास्तव

रेखा श्रीवास्तव

लेखन कार्य बचपन से आरम्भ किया और नौ वर्ष की आयु में दैनिक जागरण के बाल जगत पृष्ठ पर प्रकाशन शुरू हुआ। किशोरावस्था में कविता, कहानी और आलेख लेखन भी शुरू होकर कादम्बनी, साप्ताहिक हिन्दुस्थान , धर्मयुग, सरिता और मनोरमा रहित स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशन। 24 साल आईआईटी कानपुर में रिसर्च एसोसिएट के पद पर काम। कई संस्थाओं के साथ सोशल वर्क , समाज सेवी संस्थाओं के साथ संलग्न। सम्प्रति लेखन कार्य एवं काउंसलिंग कार्य। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन जारी। ब्लोगर्स के अधूरे सपनों की कसक (संस्मरणात्मक संकलन ) - 2020 में प्रकाशन यथार्थ के रंग - (लघु कथा संग्रह ) 2022 में प्रकाशन एक घर की तलाश ( कहानी संग्रह ) 2025 में प्रकाशन। 71 पीडब्ल्यू डी हाउसिंग सोसाइटी सहकार नगर रावतपुर गाँव कानपुर - 208019 M- 9936421567