कविता

गमज़दा घर

उस मकान से
कभी आतीं नहीं
ऐसी आवाजें
जिनमें खुशियों की हो खनखनाहट।
खामोश दर,
खामोश दीवारें,
बंद बंद खिड़कियाँ,
ओस से तर हुई छतें
शायद रोई हैं रात भर ।
कोई इंसान भी नहीं
हँसता यहाँ,
मुस्कानें रख दी हैं गिरवी।
उनके यहाँ
खुशियाँ ने भी
न आने की कसम खाई है।
शायद इसीलिए
हर तरफ मायूसी छाई है।

— रेखा श्रीवास्तव

रेखा श्रीवास्तव

लेखन कार्य बचपन से आरम्भ किया और नौ वर्ष की आयु में दैनिक जागरण के बाल जगत पृष्ठ पर प्रकाशन शुरू हुआ। किशोरावस्था में कविता, कहानी और आलेख लेखन भी शुरू होकर कादम्बनी, साप्ताहिक हिन्दुस्थान , धर्मयुग, सरिता और मनोरमा रहित स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशन। 24 साल आईआईटी कानपुर में रिसर्च एसोसिएट के पद पर काम। कई संस्थाओं के साथ सोशल वर्क , समाज सेवी संस्थाओं के साथ संलग्न। सम्प्रति लेखन कार्य एवं काउंसलिंग कार्य। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन जारी। ब्लोगर्स के अधूरे सपनों की कसक (संस्मरणात्मक संकलन ) - 2020 में प्रकाशन यथार्थ के रंग - (लघु कथा संग्रह ) 2022 में प्रकाशन एक घर की तलाश ( कहानी संग्रह ) 2025 में प्रकाशन। 71 पीडब्ल्यू डी हाउसिंग सोसाइटी सहकार नगर रावतपुर गाँव कानपुर - 208019 M- 9936421567