कोख में सिसकती बेटी
कोख की दीवारों से आती
धीमी-धीमी हिचकियाँ,
जैसे कोई जीवन
मौत से पहले पूछ रहा हो —
“क्या मेरा अपराध सिर्फ़ बेटी होना है?”
नन्हीं धड़कनों को
गिना नहीं गया,
सिर्फ़ परखा गया
कि वो लड़का है या लड़की।
माँ की ममता
संघर्ष कर रही थी,
लेकिन समाज का डर
फैसला सुना चुका था।
डॉक्टर ने पर्दा गिराया,
एक साँस को रोक दिया गया,
न कोई जनम, न कोई नाम —
बस एक आँकड़ा बन गई
एक हज़ार एक सौ चौवन में एक और।
आशा जो थी —
अब उत्तरदायित्व की चूक है,
सहेली जो बनी थी —
अब मौन साक्षी है।
नारे गूंजते हैं —
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”
पर ज़मीनी सच है —
“बेटी न जन्मे तो बेहतर!”
माँ रोई, समाज हँसा,
कोख ने प्रश्न किया —
“क्या मैं कभी चुप्पी से आज़ाद हो पाऊँगी?”
कोई जवाब नहीं था,
सिर्फ़ क़ानून की फाइलें थीं,
और शर्म से झुकी आँखें —
जो अपराध देखकर भी
कुछ न बोल सकीं।
“बेटी! तू जन्म ले…”
बेटी!
तू जन्म ले
इस धरती को फिर से जीवन दे,
जिसने तुझे मारा —
उसी को संवेदना की परिभाषा दे।
तेरे जन्म से ही
संस्कृति का सूरज उगता है,
तू न हो,
तो सभ्यता की सांस भी थमती है।
— प्रियंका सौरभ
