गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

धर्म के बल पर फँसाया जा रहा है।
खूब ही अब ज़ुल्म ढाया जा रहा है।

बात खुलकर सामने आयी नहीं है।
राज़ ही अब तो छुपाया जा रहा है।।

भेदभावों की यही दुनिया बनी है।
बेगुनाहों को सताया जा रहा है।

मोल मानुष का न रहता है कहीं भी।
नाम उसका ही डुबाया जा रहा है।।

चोट दिल पर जो लगी है सह सभी ली ।
मुस्कुरा कर ग़म उठाया जा रहा है।

दुश्मनी क्यों मन पली है देख लो अब।
हर किसी का दिल जलाया जा रहा है।।

ग़म भरे नगमे सुना दे आज कोई।
देख महफ़िल को सजाया जा रहा है।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’