लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 5)
उस समय तक संध्या घिर आयी थी, अँधेरा होने को ही था। भरत जी जानते थे कि महाराज दशरथ इस समय अपने दरबार में नहीं होंगे। इसलिए वे उनसे मिलने के लिए सबसे पहले अपने पिता के महल में गये। वहाँ उन्होंने महाराज को नहीं देखा, तो उनको कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि वे जानते थे कि दरबार के बाद पिताजी का अधिकांश समय उनकी माता कैकेयी के महल में बीतता है। इसलिए उनके महल में उनको न पाकर वे अपनी माता कैकेयी के महल में गये, जो निकट में ही था।
अपने पुत्र भरत जी को देखते ही कैकेयी प्रसन्नता से भर गयीं। वे तत्काल उठकर खड़ी हो गयीं और भरत जी की ओर चलीं। भरत जी ने निकट जाकर अपनी माता के चरण स्पर्श किये। कैकेयी ने उनको गले लगाकर मस्तक सूँघा और अपने निकट बैठाया।
फिर कैकेयी ने पूछा- “बेटा! अपने नानाजी के यहाँ से कब चले थे? वहाँ सब कुशल तो हैं? मेरे पिता, माता और भाई सब कैसे हैं? तुम वहाँ सुख से तो रहे? मुझे ये सब बताओ।” भरत जी ने उत्तर दिया- “माँ! नानाजी के यहाँ से चले मेरी सात रातें बीती हैं। वहाँ सब कुशल हैं। नानाजी और मामा युधाजित भी कुशलपूर्वक हैं। मैं वहाँ बहुत सुखपूर्वक रहा। उन्होंने मुझे जो भेंट दी हैं, वे सब पीछे से आ रही हैं। मैं तेज चलने वाले घोड़ों के रथ पर जल्दी आ गया हूँ।”
फिर भरत जी ने पूछा- “माँ! पिताजी अपने महल में नहीं हैं और यहाँ पर भी नहीं हैं। मैं जानता हूँ कि अपना अधिकांश समय वे यहीं बिताया करते हैं। मुझे बताओ वे कहाँ हैं? मैं उनके दर्शन करने और उनके चरण स्पर्श करने की इच्छा से यहाँ आया हूँ।”
कैकेयी को पहले से ही भरत जी से इस प्रश्न की आशा थी। लेकिन वह बहुत चतुर महिला थी, वह एक साथ सारी बात बताकर भरत जी को रुष्ट नहीं करना चाहती थीं। इसलिए कैकेयी बहुत कोमल शब्दों में बोली- “पुत्र! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ बहुत बड़े धर्मात्मा और तेजस्वी थे। एक दिन सभी प्राणियों की जो गति होती है, वे उसी गति को प्राप्त हुए हैं।”
कैकेयी के शरीर पर विधवा होने का कोई चिह्न नहीं था, इसलिए भरत जी को कल्पना नहीं थी कि उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया है, परन्तु माँ की बात सुनकर भरत जी समझ गये कि महाराज की मृत्यु हो गयी है। यह समझते ही वे भूमि पर गिर पड़े और “हाय पिताजी!” कहकर विलाप करने लगे। वे अपने मुख को कपड़े से ढककर विलाप करते रहे और भूमि पर लोटते रहे। कुछ देर तक विलाप करने के बाद कैकेयी ने उनको हाथ पकड़कर उठाया और सांत्वना दी- ”उठो पुत्र! भूमि पर क्यों पड़े हो? तुम्हारे जैसे बुद्धिमान और सम्मानित व्यक्ति इस प्रकार शोक नहीं किया करते।“
परन्तु भरत जी उसी प्रकार रोते रहे। फिर उन्होंने रोते-रोते पूछा- “माँ! मैं तो यह सोचकर आया था कि पिताजी भैया श्री राम का राज्याभिषेक संस्कार करेंगे और स्वयं यज्ञ का अनुष्ठान करेंगे। मुझे यह आशंका नहीं थी कि पिताजी का स्वर्गवास हो गया होगा। यहाँ सब कुछ मेरी आशा के विपरीत हुआ है। यह सोचकर मेरा हृदय फटा जा रहा है।“ वे फिर विलाप करने लगे।
कुछ देर विलाप करने के बाद उन्होंने रोते-रोते पूछा- ”माँ! पिताजी को ऐसा कौन-सा रोग हो गया था कि वे मेरे आने से पहले ही चल बसे? उनको निश्चय ही मेरे आने का ज्ञान नहीं रहा होगा, अन्यथा वे मेरे आने तक अवश्य रुके रहते। अब मेरे लिए बड़े भाई श्री राम ही पितातुल्य हैं। मैं उनके चरण स्पर्श करूँगा। तुम शीघ्र ही उनको मेरे आने की सूचना दो। पिताजी अन्तिम समय में मेरे लिए क्या कह गये हैं? मैं उसे सुनना चाहता हूँ।”
कैकेयी समझ गयी कि अब भरत को सारी बात बतानी ही पड़ेगी। फिर भी उसने कोमल शब्दों में कहा- “बेटा! तुम्हारे पिता अन्तिम समय में ‘हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!’ कहते हुए स्वर्ग सिधारे थे। अन्तिम बात उन्होंने यह कही थी कि जो लोग सीता के साथ पुनः लौटकर आये हुए श्री राम और लक्ष्मण को देखेंगे, वे बहुत भाग्यशाली होंगे।”
माँ की यह बात सुनकर भरत जी को यह समझते देर न लगी कि किसी कारणवश श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी कहीं चले गये हैं, जिनके शोक में पिताजी ने प्राण त्याग दिये हैं। इससे वे और अधिक शोकाकुल हो गये और पूछा- “माँ! भैया श्री राम, भाभी सीता जी और भाई लक्ष्मण जी ये तीनों कहाँ चले गये हैं और क्यों?”
कैकेयी ने फिर भी भरत जी को पूरी बात नहीं बतायी। उसने बस इतना कहा- ”पुत्र! श्री राम वल्कल वस्त्र धारण करके सीता के साथ दण्डक वन को चले गये हैं और लक्ष्मण ने भी उन्हीं का अनुसरण किया है।“
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण कृ. 10, सं. 2082 वि. (20 जुलाई, 2025)
