सर्वव्यापी
इस जहां में क्रोध और झूठ ही सर्वव्यापी है,
जिंदगी तहस नहस करने के लिए
ये दोनों मानवीय गुण काफी है,
दुनिया में वही ढंग से जीता है,
जो क्रोध को अपने अंदर पीता है,
झूठ ने बहुतों का घर उजाड़ा है,
सुखी जीवन का कर देता कबाड़ा है,
झूठ कुछ मतलबी लोगों का
परमप्रिय प्यारा दुलारा होता है,
तात्कालिक लालच का सहारा होता है,
इसे कोई भी बोल सकता है,
बड़े प्रेम से इसकी दुकान खोल सकता है,
पिता,माता,भाई,बहन,पत्नी,बच्चे,रिश्तेदार,
किसी को भी हो सकता है झूठ से प्यार,
मगर इनके असत्य उतने बुरे नहीं होते
जितने राजनेताओं के होते हैं,
ये झूठ पीते हैं और हर सुबह मुंह धोते हैं,
झूठ किसी की सत्ता हिला सकता है,
तो किसी की शासन सत्ता ला सकता है,
लेकिन सोचो जरा क्या ये उचित है?
दरअसल यह सर्वथा अनुचित है,
संतों,महापुरुषों ने इसे वर्जित किया है,
अपने आसपास भी इन्हें जगह नहीं दिया है,
न कहना इसे कि
यह आज के समय का तकाजा है,
यह दोनों हमेशा जख्म कर देते ताजा है।
— राजेन्द्र लाहिरी
