उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 8)

प्रातःकाल होते ही वहाँ मुनि वशिष्ठ जी उपस्थित हो गये। उन्होंने शोकग्रस्त भरत जी को सांत्वना दी और कहा- “यशस्वी राजकुमार! महाराज का स्वर्गवास हम सबके लिए एक अत्यन्त दुःखद घटना है। यह प्रभु का विधान है, जिसमें हम कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते। अब शोक मनाते रहने से कोई लाभ नहीं है। इसलिए शोक छोड़ो और इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य है, उसकी ओर ध्यान दो। महाराज का पार्थिव शव तेल के कड़ाह में सुरक्षित रखा गया है। उसे राजोचित दाहसंस्कार के लिए ले जाने का प्रबन्ध करो।”

वशिष्ठ जी की बात सुनकर राजकुमार भरत जी ने अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम किया, अपने आँसू पोंछ डाले और फिर अपना कर्तव्य करने को तैयार हो गये। सबसे पहले उन्होंने महाराज दशरथ के शव को तेल के कड़ाह से निकलवाया। लगातार लगभग दस दिन तक तेल में रहने के कारण शव का मुख पीला सा पड़ गया था, परन्तु उसमें विकृति का कोई चिह्न नहीं था। ऐसा लगता था जैसे महाराज प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे हों। शव को पहले साफ वस्त्रों से पोंछा गया, फिर उसको विधिवत् स्नान कराया गया और अन्त में नये वस्त्र पहनाये गये। फिर शव को उत्तम शय्या पर सुलाया गया।

अपने पिता को इस स्थिति में देखकर भावुक होकर भरत जी फिर विलाप करने लगे और रोते हुए कहने लगे- ”पिताजी! मैं तो परदेश में था और आपके पास नहीं पहुँच पाया, परन्तु आपने बड़े भैया-भाभी को वन में भेजकर स्वर्ग में जाने का निश्चय क्यों कर लिया? आप तो स्वर्ग में गये और श्री राम वन में चले गये, अब इस नगर के योगक्षेम की व्यवस्था कौन करेगा? आपके बिना यह पृथ्वी शोभाहीन हो रही है।“

भरत जी को इस प्रकार विलाप करते हुए देखकर महामुनि वशिष्ठ ने फिर उनको समझाया- ”राजकुमार! यह समय रोने-धोने का नहीं है। धैर्य धारण करके इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य है शान्त चित्त से उसे पूरा करो।“ यह सुनकर भरत जी ने ”जो आज्ञा गुरुदेव!“ कहकर उनका आदेश शिरोधार्य किया और महाराज का प्रेतकर्म करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गये।

पहले विद्वान् ब्राह्मणों ने यज्ञशाला से लायी गयी समिधाओं से विधिपूर्वक हवन कराया। उसके बाद महाराज के पार्थिव शरीर को पालकी में रखकर अन्तिम संस्कार के लिए सरयू नदी के तट पर ले जाया गया। शव के साथ सभी परिवारी, मन्त्री और सेवक भी चले। राज कर्मचारी महाराज के शव के ऊपर से धन और वस्त्र आदि लुटाते जा रहे थे।

सरयू तट पर पहुँचकर श्मशान भूमि में उनके लिए चिता तैयार की गयी, जिसमें चन्दन, देवदारु आदि की लकड़ियाँ और विभिन्न प्रकार के सुगन्धित पदार्थों का उपयोग किया गया था। चिता तैयार हो जाने के बाद पुरोहितों ने महाराज दशरथ के शव को उठाकर चिता पर रखा। फिर वेदमंत्रों का पाठ किया गया।

तब तक तीनों रानियाँ रथों में बैठकर श्मशान स्थल पर आ गयी थीं, क्योंकि श्मशान भूमि में महिलाओं के आने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। रानियों के आ जाने पर चिता में अग्नि लगायी गयी। फिर रानियों और उनकी सेविकाओं सहित सभी ने चिता की परिक्रमा की। उस समय रोती हुई रानियों का करुण क्रन्दन ही सुनायी दे रहा था।

दाहसंस्कार सम्पन्न हो जाने के बाद रानियों सहित सभी ने सरयू के जल में प्रवेश करके महाराज को जलांजलि दी। फिर वे सभी आँसू बहाते हुए नगर में लौट आये। सभी ने भूमि पर शयन करते हुए दस दिन तक दुःख में समय बिताया।

दस दिन की अवधि पूरे होने पर ग्यारहवें दिन राजकुमार भरत ने विशेष रूप से शुद्धि स्नान किया और उस दिन किये जाने वाले श्राद्ध आदि सभी परम्परागत कार्य सम्पन्न किये। इसी प्रकार बारहवें दिन भी उन्होंने अन्य प्रकार के श्राद्ध कर्म किये। उस दिन उन्होंने ब्राह्मणों को धन और अनेक प्रकार की वस्तुएँ दान कीं।

महाराज दशरथ के दाह संस्कार के बाद तेरहवें दिन भरत जी तथा शत्रुघ्न जी अपने पिता की अस्थियों का संचय करने गये। यह कार्य करते हुए दोनों भाई बहुत भावविह्वल हो गये थे और अपने पिता को याद करके विलाप करने लगे थे। उनको विलाप करते देखकर गुरु वशिष्ठ और मंत्री सुमन्त्र जी ने उनको सांत्वना दी। वशिष्ठ जी ने कहा था, ”राजकुमारो! यह समय विलाप करने का नहीं है। इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य है, उसे पूरा करो। शोक छोड़ दो।“ इन शब्दों से दोनों भाइयों को बहुत सांत्वना मिली और उनका शोक कम हुआ। फिर वे सभी आवश्यक कार्य सम्पन्न करके राजमहल में लौट आये।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 2, सं. 2082 वि. (26 जुलाई, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com