गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

किसी बात पर मुस्कुरा कर चले हैं।
अभी हर खुशी वो लुटा कर चले हैं।।

दिया साथ कब है किसी ने कभी भी।
मगर आज रिश्ता निभा कर चले हैं।।

अँधेरा रहेगा न अब तो किसी दर।
सभी दीप देखो जला कर चले हैं।।

हमें तो वतन हित सुनो आज जीना।
ये ज़ज़्बात सबको दिखा कर चले हैं।।

लिया है सभी ने क़फ़न बाँध देखो।
हथेली रखी जान लेकर चले हैं।।

हमें जान से भी प्यारा लगा है।
दिलों में तिरंगा बसा कर चले है।।

हमें मातृभू ही लगे आज प्यारी।
इसे शीश सारे नवाकर चले हैं।।

खड़े जिस ज़मीं पर लगे रोज़ जन्नत।
यहाँ आज शोणित बहा कर चले हैं।।

न दुश्मन कभी पाँव अपने जमाये।
अभी शत्रुता को दबा कर चले हैं।।

रहे रक्षित ही देश सुन लो हमारा।
वतन के लिए सिर कटा कर चले हैं।।

रहें देशवासी सदा मिल यहाँ पर।
यही ख़्वाब दिल में सजा कर चले हैं।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’