कविता

खाली जेब का मालिक

चाँद की इतनी तारीफ़ क्यों भै,
लबों को पँखुडी, आँखों को जाम क्यों लिखना है?
क्या रखा है गज़लों, वज़लों या नज़्मों में
क्यों कोई बेरोज़गार की पीठ सहलाता नहीं?
इश्क हमसे किया नहीं किसीने
किसकी अदाओं पर उपमाओं की इबारत रचें?
हमें रात के सन्नाटों से डर नहीं लगता
न संसार की कोई रानाइयाँ लुभाती है
हमारे लिए बाज़ार की रौनक मरघट की भाँति
आकाश हमें छूना नहीं, न ज़मीन पर कोई हक है
अभाव में कट रही यहाँ
क्यों किसीके प्रभाव में जिए?
राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र नहीं हमारी
कहो समाज में धँसकर क्या करेंगे?
कहीं पैसे बँट रहे हो तो बताना
कतार में हम भी खड़े रहेंगे…
अंतहीन लंबी सड़कें लकीरों में लिखी है
ठहराव की गुंजाइश ही कहाँ
कब मांगा कल्पवृक्ष हमने.!
एक हरी डार की तमन्ना भी पूरी न कर सका
प्रार्थनाएं मेरी खारिज कर दी गई
कौन दीया जलाए मंदिर में मूरत मौन खड़ी..
सोने दो बाबा भोर से हमारा क्या लेना-देना?
होता रहेगा सूर्योदय हमारे हिस्से तमस है आया
दूर रहो मुझसे अपनी ही इच्छाओं का कातिल हूँ
महलों का स्वामी नहीं जो मित्रगण में शामिल करते हो
समझा करो यार खाली जेब का मालिक हूँ
कँचे भरकर खनका रहा हूँ, साख का सवाल जो है
परहेज़ करो तुम भी मुझसे जैसे औरों का व्यवहार है
गुनाह मेरा गरीबी, सज़ा मेरी अकेलापन
इतना जाँबाज़ हूँ कि साँसें ले रहा हूँ, लेने दो
क्या मैं ज़िंदा रह सकता हूँ?
हाँ तो? सावन है बरसात तो होगी ही न
इसमें इतना खुश क्यूँ होना? नहीं भीगना मुझे
मेरे ख़्वाबगाह की नमी को छुआ क्या किसीने?
ऋतुओं का बदलना तुम्हें मुबारक
जिस दिन किस्मत का मौसम बदलेगा
तब हम भी बात करेंगे फिलहाल सोने दो।

— भावना ठाकर ‘भावु’

*भावना ठाकर

बेंगलोर