हरियाली तीज: एक सावन की पुकार
विरह-वृष्टि में भीग रही,
पलकों की सूनी हरियाली।
झूले की टूटी डोरी-सी,
डोलती जीवन की लाचारी।
मेंहदी सूखी, रंग न आए,
पी की पायल रह गई मौन।
चूड़ियों की टूटी छन-छन में,
सुनती हूँ सावन की टन-टन।
नीम की डाली पूछ रही,
कब लौटेगा उसका सावन?
कौन भरेगा काँच की काया,
किसके संग बहेगा पावन?
श्रृंगार अब व्यर्थ प्रतीत हो,
जब नयन प्यासे, मन उजड़ा।
हरियाली में हरापन है पर,
भीतर कोई रंग न जड़ा।
प्रिय गया जो पथ अनजाना,
तेज हवाएँ सिसकी बन गईं।
शिव-पार्वती की कथा अधूरी,
मेरे आँगन चुप्पी बन गई।
सखियाँ अब बाज़ारों में हैं,
काँच-पट्टियों के काँच सपने।
मेरे गीत चुपके बिसरे,
मन पंखों में उलझे अपने।
हाय! तीज भी अब उत्सव है,
भोग बना, योग नहीं रहा।
व्रत की थाली, सेल्फी में खोई,
मौन तपस्विनी कहीं नहीं रहा।
— प्रियंका सौरभ
