सावन का प्राकृतिक सौंदर्य एवं भगवान शिव की भक्ति –
प्रकृति के सुकुमार कवि ‘ पंत ‘ ने लिखा-
” झम झम झम झम मेघ बरसते हैं सावन के ,
छम छम छम गिरती बूंदे तरूओं से छन के ।
चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के ,
थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के।”
पवित्र सावन माह आते ही हमारे आस – पास का वातावरण अत्यंत मनमोहक व भक्ति के भाव में डूबा नजर आने लगता। यह माह है ही कुछ ऐसा जिसमें आनंद और भक्ति दोनों साथ – साथ मिलते हैं। जहां एक ओर प्रकृति का हरे रंग से श्रृंगार हो रहा होता है, बागों में झूले पड़ जाते हैं, खेतों में, खलिहानों में सावन के गीत लोगों के अधरों से अनायास ही प्रस्फुटित होते हैं। नदी, झरने, तालाब सभी आह्लादित हैं तो वहीं दूसरी ओर मंदिरों की घंटियां, शंखध्वनि, ऋषियों के आश्रम से आरती और भगवान शिव की स्तुति के भजन पूरे परिवेश में भक्ति का संचार कर देता है। सावन का महीना शिव जी को समर्पित होता है। इस महीने में भगवान शिव-पार्वती की पूजा होती है। कवि ने इस कविता में भगवान शिव की महिमा को बहुत सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है। सावन का महीना शंकर जी को बहुत प्रिय होता है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार जो भी भक्त श्रद्धा से सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। श्रद्धा का यह महासावन भगवान शिव के प्रति समर्पित होकर ग्रंथियों को खोलने की सीख देता है। अनेकों श्रेष्ठ साहित्यकारों, कवियों , लेखकों ,चित्रकारों और कलाकारों को सावन का सौंदर्य, सभ्यता और संस्कृति को आदिकाल से ही आकर्षित करता रहा है। सावन के माह को वर्षा ऋतु का पर्याय माना जाता है। वर्षा और सावन की जुगलबंदी मशहूर और मोहक है। महाकवि कालिदास ने मेघ का सुन्दर वर्णन ” मेघदूत” में किया है। उन्होंने ‘मेघदूत ‘का प्रारंभ आषाढ़ मास से किया है, पर पावस ऋतु का विधिवत् प्रारंभ सावन माह से ही होता है।’ मेघदूत ‘ में कालिदास का यक्ष मेघ को ताजे खिले हुए कुटज के फूलों का अर्घ्य देकर उसका अभिनंदन करता है। ‘ॠतुसंहार ‘ में भी कालिदास ने वर्षा के आगमन का रोचक चित्रण किया है। कहा भी गया है कि ” यदि सावन में ‘मेघदूत’ को नहीं पढ़ा तो भारतीय संस्कृति में मेघों के उत्सव को आपने समझा ही नहीं। महाकवि कालिदास लिखते हैं कि-
“मेघोदरविनिर्मुक्ताःकर्पूरदलशीतलाः।
शक्यमञ्जलिभिः पातुंवाताः केतकगन्धिनः।।”
” मेघ के उदर से निकली कपूर की डली के समान ठंढ़ी तथा केवड़े की सुगंध से भरी हुई इस बरसाती वायु को मानो अञ्जलियों में भरकर पीया जा सकता है।”
सावन हमारे अंदर के हरेपन को जीवित रखने का मौसम है जो न केवल हमें आनंदित करता है बल्कि हममें एक नई किस्म का आलोड़न ,प्रसन्न्ता ,और स्फूर्ति भरता है। सावन के साथ हमारी सामूहिकता की भावना और साहचर्य का सुख जुड़ा हुआ है।सावन में साथ- साथ झूला झूलने और कजरी के गीतों का आनंद ही कुछ और है। महाकवि सूरदास राधा – कृष्ण के वर्षा में भींगते- भीगते कुंज में आने का मोहक वर्णन करते हैं-
” कुंजन में दोउ आवत भीजत
ज्यों ज्यों बूंद परत चूनर पर, त्यों त्यों हरि उर लावत
अधिक झकोर होत मेघन की, द्रुम तरू छिन छिन गावत
वे हंसि ओट करत पीताम्बर, वे चुनरी उन उढ़ावत ।”
सावन हमारे भीतर का सुप्त राग है जो हमें झंकृत करता है और हमारे भीतर के सृजनात्मकता को नए आयाम देता है। वर्षा की बूंदों के साथ -साथ शीतलता परोसने और सबको जीवन देने का दर्शन समझने की जरूरत है।” वेद ,रामायण,अन्य संस्कृत साहित्यों से लेकर भक्तिकालीन और आधुनिक साहित्यों में सावन के सौंदर्य का रोचक वर्णन किया गया है। सावन की बदरिया के सौंदर्य को देखकर मीरा गाती है-
” बरसै बदरिया सावन की , सावन की मनभावन की
सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की ।”
सावन मन की वह भागवत है जिसके आनन्द को हमारा मन बांचता है और वह गीत गोविंद है जिसकी हरेक अष्टपदी के प्रत्येक शब्द पर देह का रोम रोम थिरकता है। सावन की झड़ी में बरसने वाली हर बूंद में नृत्य की पुलक समाई रहती है। सावन में बूंदे बरसती नहीं थिरकती हैं।
गोस्वामी तुलसीदास ने ‘ रामचरितमानस ‘ में लोक जीवन की उपमाओं के साथ लिखा है-
“घन घमंड नभ गरजत घोरा , प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।
दामिनी दमक रहहिं घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।
दादुर धुन चहुं दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।।
इस प्रकार हम देखते है कि सावन का वर्णन भक्तिकाल, रीतिकाल, मध्यकाल, छायावाद काल एवं आधुनिक काल अर्थात् में साहित्य के हर कालखंड में कवियों ने ,साहित्यकारों ने सावन और पावस के सौंदर्य का मनोरम वर्णन किया है।
— बाल भास्कर मिश्र
