सामाजिक

स्त्री नहीं, सोच घर बनाती और बिगाड़ती है

हमारे समाज में कुछ फैसले ऐसे हैं जिन पर कभी बहस नहीं हुई, फिर भी वे अंतिम सत्य मान लिए गए हैं। उन्हीं में से एक है—“घर बनाती भी स्त्री है और और घर बिगाड़ती भी वही है।” परिवार में सुख, संस्कार और रिश्तों में मधुरता हो तो कहा जाता है—“बहू बहुत अच्छी मिली है।” लेकिन तनाव या विघटन होते ही आरोप सबसे पहले उसी पर आता है, मानो घर किसी एक व्यक्ति द्वारा चलने वाली व्यवस्था हो। यह केवल सामाजिक पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि वह मानसिकता है जिसने स्त्री के त्याग को कर्तव्य और उसकी पीड़ा को नियति मान लिया है। प्रश्न यह नहीं कि स्त्री की भूमिका महत्वपूर्ण है या नहीं—वह निस्संदेह है, बल्कि यह है कि क्या वह अकेली जिम्मेदार है? यदि घर बनाना सामूहिक प्रक्रिया है, तो उसका बिगड़ना भी सामूहिक विफलता है। फिर हर बार कठघरे में केवल स्त्री ही क्यों? यह प्रश्न परिवार के भविष्य से जुड़ा है।

घर एक व्यवस्था है, कोई व्यक्ति नहीं

हम अक्सर घर को चार दीवारों और छत का नाम मान लेते हैं, जबकि वह भावनाओं, संघर्षों और रिश्तों से बनी एक जीवंत व्यवस्था है। वहां भावनाएं, उम्मीदें, समझौते और रिश्ते सभी रहते हैं। इसमें माता, पिता, बच्चे और बुजुर्ग सभी की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण होती है। फिर भी यह धारणा बना ली गई है कि घर की सफलता का श्रेय पूरे परिवार को मिलेगा, लेकिन उसकी विफलता का दोष केवल स्त्री पर जाएगा। क्या कोई खेत केवल बारिश से लहलहाता है, क्या कोई वृक्ष केवल जड़ों से खड़ा रहता है, क्या कोई नदी केवल एक स्रोत से बहती है? जब हर प्राकृतिक संरचना सामूहिक योगदान से बनती है, तो परिवार जैसी जटिल संस्था की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति पर कैसे डाली जा सकती है?

लक्ष्मी बनाकर बोझ क्यों?

भारतीय समाज ने स्त्री को सम्मान देने के लिए उसे देवी, लक्ष्मी और अन्नपूर्णा कहा, लेकिन यह सम्मान कई बार बोझ बन गया। देवी बना देने से उसके इंसान होने का अधिकार सीमित हो गया—उसके थकने, रोने, गलती करने और अपनी इच्छाएँ रखने की गुंजाइश कम हो गई। उससे अपेक्षा की गई कि वह हर परिस्थिति में मुस्कुराए, सबको जोड़े रखे और स्वयं को सबसे अंत में रखे। विडंबना यह है कि जिस सम्मान के कारण उसे ऊँचा स्थान दिया गया, उसी पर इतना दायित्व डाल दिया गया कि वह दबने लगी, और जब वह थक गई तो कहा गया—“घर संभाल नहीं पाई।”

नई भूमिकाएँ, पुराने बोझ

आज की स्त्री केवल रसोई तक सीमित नहीं है; वह डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी और उद्यमी बनकर परिवार की आर्थिक रीढ़ भी बन रही है। फिर भी जिम्मेदारियाँ उसके साथ समान रूप से साझा नहीं की गई हैं—दफ्तर से लौटने के बाद भी रसोई, बच्चों की पढ़ाई, रिश्तेदारियों का निर्वाह और बुजुर्गों की देखभाल अधिकतर उसी पर बनी रहती है। समाज ने उसके कंधों पर नए दायित्व जोड़ दिए, लेकिन पुराने बोझ कम नहीं किए। यह व्यवस्था उसे सशक्त नहीं बनाती, बल्कि धीरे-धीरे भीतर से थका देती है। और जब यह थकान या असंतोष सामने आता है, तो उसे “स्त्री का स्वभाव” कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

समस्या स्त्री नहीं, सोच है

दरअसल समस्या स्त्री या पुरुष नहीं, बल्कि सोच है—जो घर की जिम्मेदारी स्त्री पर और अधिकार पुरुष पर मान लेती है, और त्याग को केवल स्त्री का गुण समझती है। यही सोच पुरुष की अनुपस्थिति को मजबूरी और स्त्री की थकान को कमजोरी मानती है। घर मतभेद या आर्थिक संकट से नहीं टूटते, बल्कि तब टूटते हैं जब संवाद और सम्मान समाप्त हो जाता है और लोग परिस्थितियों से लड़ने के बजाय एक-दूसरे से लड़ने लगते हैं। इसलिए किसी घर को बचाना है तो सबसे पहले सोच बदलनी होगी।

साझेदारी से सशक्त परिवार

सशक्त परिवार की पहचान विवादों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उनका मिलकर समाधान है। जहां पति समझे कि परिवार केवल आर्थिक संसाधनों से नहीं चलता, पत्नी महसूस करे कि उसके संघर्षों को समझा जा रहा है, बच्चे जिम्मेदारियां सीखें और बुजुर्ग अनुभव साझा करें, दबाव नहीं। परिवार तब मजबूत होता है जब हर सदस्य स्वयं को सहभागी माने, बोझ नहीं। सम्मान बड़े उपहारों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार—एक धन्यवाद, एक क्षमा, संवेदनशील संवाद और एक-दूसरे की थकान को समझने से आता है। यही छोटे प्रयास बड़े संकटों को भी कम कर देते हैं।

उंगली नहीं, आईना उठाओ

जब भी कोई घर टूटे, समाज को अपनी पुरानी आदत बदलनी होगी। हर बार स्त्री को दोषी ठहराने से न घर बचते हैं, न रिश्ते। घर टूटने के कारण गहरे हैं—अहंकार, संवादहीनता, असमान जिम्मेदारियां और सम्मान की कमी। स्त्री घर की धुरी हो सकती है, पर वह अकेला पहिया नहीं है; परिवार एक रथ है जिसे सभी मिलकर चलाते हैं। एक पहिया टूट जाए तो रथ नहीं चलता। लेकिन यदि बाकी पहिए भी अपनी जिम्मेदारी भूल जाएं तो फिर दोष केवल एक पहिए का नहीं होता। समय है कि स्त्री को देवी नहीं, इंसान मानकर साझेदारी दी जाए। घर एक के त्याग से नहीं, सबके सहयोग से बनता है, और उसके बिगड़ने का दोष भी किसी एक पर नहीं डाला जा सकता। समाज जब यह सरल सत्य स्वीकार करेगा, तभी परिवार अधिक न्यायपूर्ण, मानवीय और मजबूत बनेंगे। तब घरों में कटघरे नहीं, संवाद होंगे; आरोप नहीं, सहभागिता होगी। तब समझ आएगा कि घर बनाने वाली केवल स्त्री नहीं, बल्कि वह सोच है जो “मैं” से ऊपर उठकर “हम” में विश्वास करती है।

— कृति आरके जैन

कृति आरके जैन

बड़वानी (मप्र) संपर्क: 79992 40375 ईमेल: kratijainemail@gmail.com

Leave a Reply