कविता

जीने की कहानी

दावा नहीं करती दवा,
रोग मिटाने का कभी,
दुआ काम करती है वहाँ,
बस दो मीठे बोल लिए।

पता चल जाता है,
कौन अपना, कौन पराया,
बोल ही तो होते हैं,
शख्सियत का आईना।

झूठ-फरेब के रिश्ते-नाते,
न कोई अपना, न पराया,
मतलब की दुनिया में,
मोहरा बनाते अपने ही।

चित्त और मात होती
जहाँ उन्हीं के मुताबिक,
किस पर करें भरोसा,
किसको मानें अपना यहाँ।

हैं हम भी तो आखिर,
उसी भीड़ में शामिल,
उँगली किसी ओर करते हैं,
तो चार अपनी ओर होती हैं।

इसलिए न हो शिकवा,
न रखे गिला किसी से,
जो लिया, यहीं से लिया,
जो खोया, यही का होगा।

चार दिन की ज़िंदगानी है,
हँस-खिलकर जी लें इसे,
यही तो जीवन की रवानी है,
यही जीने की कहानी है।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com

Leave a Reply