फिर आई पुरवाई
फिर आई पुरवाई,
तन मन में उमंग छाई,
रिमझिम बूॅंदे बरसाई,
चहुॅं ओर खुशियॉं छाई ।
मन में उठे मीठी हिलोर,
पवन करे “आनंद” शोर,
उपवनों में झूमे हैं मोर,
अमृत बरसे है घनघोर ।
कजरी गीत दे सुनाई ,
सजनी सखी हर्षाई,
प्रकृति भी मुस्कुराई,
मस्ती हर मन में छाई ।
पत्ता पत्ता है डोला,
संगीत मधुर है घोला,
भीगा सतरंगी चोला,
मन हुआ बॉंवरा भोला ।
कोयलिया कूके कारी,
शोभा प्रकृति की प्यारी,
ऋतु बरखा की न्यारी,
खिली देखो फुलवारी ।
— मोनिका डागा “आनंद”
