एक दिन हर माँ अपनी माँ के सामने हार जाती है
जीवन कुछ सच बहुत देर से खोलता है। उनमें सबसे गहरा सच यह है कि माँ का अर्थ तब समझ आता है, जब स्वयं माँ बनने की बारी आती है। समाज मानता है कि इसके बाद स्त्री का पूरा संसार उसके बच्चों में सिमट जाता है, लेकिन उसके भीतर एक और यात्रा शुरू होती है—अपनी माँ तक लौटने की यात्रा। वह पहली बार उस स्त्री के मौन जीवन को पढ़ती है, जिसे बरसों से केवल “माँ” कहकर पुकारती आई थी। तब उसे समझ आता है कि माँ होना केवल प्रेम देना नहीं, बल्कि हर दिन स्वयं का एक हिस्सा चुपचाप अर्पित करते जाना है। शायद इसलिए कुछ महिलाएँ अपने बच्चों से अधिक अपनी माँ के लिए रोती हैं। ये आँसू तुलना के नहीं, उस प्रेम की देर से हुई पहचान के होते हैं, जिसका प्रतिदान कभी पूरा नहीं हो पाता।
- जब स्मृतियाँ माँ का चेहरा ओढ़ लेती हैं
पहली बार शिशु को बाँहों में लेते ही स्त्री का मन भविष्य नहीं, बचपन में लौट जाता है। बच्चे की हर साँस पर ठहरती निगाहें याद दिलाती हैं कि उसकी माँ भी इसी बेचैनी में उसकी हर करवट पर पहरा देती रही होगी। वह बच्चे को सीने से लगाती है, तो वही सुरक्षित ठिकाना याद आता है, जहाँ सिर रखते ही डर खो जाते थे। उसी क्षण उसकी आँखों की नमी बच्चे के लिए नहीं, उस माँ के लिए होती है, जिसके प्रेम की भाषा उसे अब समझ आई है।
- त्याग का अनदेखा चेहरा
बचपन में माँ का त्याग त्याग नहीं लगता, वह जीवन का सामान्य क्रम होता है। वही परिस्थितियाँ स्त्री के हिस्से आते ही अनदेखे सच सामने ले आती हैं। बच्चे की एक मुस्कान के लिए वह भूख, नींद, इच्छाएँ और सपने किनारे रख देती है। तब उसे समझ आता है कि उसकी माँ भी बरसों इसी तरह स्वयं को पीछे करती रही होगी। यह अनुभूति गर्व नहीं, गहरी कसक छोड़ जाती है—काश, उसने माँ के मौन समर्पण को समय रहते पढ़ लिया होता।
- हर स्पर्श में माँ लौट आती है
माँ बनने के बाद स्त्री का वर्तमान कभी अकेला नहीं रहता। बच्चे की हर मुस्कान में उसे अपनी माँ की मुस्कान झिलमिलाती दिखाई देती है। नन्ही उँगली थामते ही बरसों पहले अपनी उँगली थामने वाली झुर्रियों भरी हथेली याद आ जाती है। वह बच्चे को लोरी सुनाती है, लेकिन भीतर अपनी माँ की थकी, स्नेहभरी आवाज़ गूँज उठती है। तभी उसे लगता है कि माँ स्मृतियों से नहीं, ममता से लौटती है; इसलिए उसका वर्तमान अतीत से अलग नहीं हो पाता।
- पश्चाताप का सबसे मौन ऋण
जीवन की सबसे गहरी टीस उस प्रेम की होती है, जिसका उत्तर समय रहते नहीं दिया जा सका। माँ बनने के बाद स्त्री बार-बार उन क्षणों में लौटती है, जब उसने माँ की बात टाल दी, उनकी चिंता को झुँझलाहट समझ लिया या मान लिया कि माँ हमेशा साथ रहेंगी। बच्चे की छोटी तकलीफ़ पर बेचैन होते ही पुरानी बेरुख़ी भीतर सुनाई देने लगती है। उसकी आँखों से झरते आँसू केवल दुःख नहीं, उस मौन क्षमा के होते हैं, जिसे वह माँ से कभी कह नहीं सकी।
- हर खुशी की एक खाली जगह
कुछ अनुपस्थितियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं; वे हर उत्सव का हिस्सा बन जाती हैं। जिन महिलाओं की माँ इस दुनिया में नहीं हैं, वे बच्चों का हर जन्मदिन मुस्कुराकर मनाती हैं, लेकिन मन में एक खाली कुर्सी लगी रहती है। उन्हें लगता है—काश, माँ आज होतीं; नाती या नातिन को गोद में उठातीं, साथ हँसतीं, आशीर्वाद देतीं। बच्चे को चूमते ही अधूरी इच्छा जाग उठती है। इसलिए उनकी मुस्कान के पीछे एक शांत उदासी जीवन भर साँस लेती है।
- समय से हारती बेटियाँ
कुछ बिछड़नें मृत्यु से बहुत पहले शुरू हो जाती हैं। जिन स्त्रियों की माँ अभी साथ हैं, वे हर दिन उन्हें समय के हाथों छूटता देखती हैं। दिन भर बच्चे को सँभालने वाली स्त्री शाम होते ही माँ के सिरहाने बैठ जाती है। उसे मालूम है, बच्चे एक दिन अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे, लेकिन माँ के जाने का खालीपन कभी नहीं भरेगा। इसलिए माँ के माथे पर हाथ फेरते उसकी आँखें भीग जाती हैं, मानो वह फिसलते समय को हथेली में रोक लेना चाहती हो।
- रात, जहाँ बेटी जागती है
दिन का उजाला स्त्री से उसके सारे रिश्ते निभवा लेता है—माँ, पत्नी, बहू और बेटी। रात का सन्नाटा उसके भीतर की बेटी को जगा देता है। वह धीरे से माँ का नाम पुकारती है; कभी मन ही मन क्षमा माँगती है, कभी बिना शब्दों के रो पड़ती है। ये आँसू किसी की नज़र के लिए नहीं बहते। ये उस प्रेम की मौन प्रार्थना हैं, जिसे कोई भाषा व्यक्त नहीं कर सकती।
- ममता की असली विरासत
जो स्त्री अपनी माँ के दर्द को समझ लेती है, उसकी ममता केवल जन्म से नहीं, अनुभव से जन्म लेती है। वही बच्चों के मन की अनकही धड़कनों को सबसे गहराई से सुन पाती है। वह जान चुकी होती है कि प्रेम केवल देना नहीं, मिले प्रेम का सम्मान करना भी है। इसलिए उसकी गोद में केवल बच्चे नहीं पलते; वहाँ उसकी माँ की सीख, धैर्य और निस्वार्थ त्याग अगली पीढ़ी तक पहुँचता रहता है।
- माँ का सबसे लंबा सफ़र
समय माँ का चेहरा धुँधला कर सकता है, लेकिन उसके संस्कार कभी धुँधले नहीं होते। एक दिन स्त्री अनायास वही शब्द बोलती है, वही ढंग अपनाती है, वही चिंता करती है, जो उसकी माँ किया करती थी। तब उसे समझ आता है कि माँ की सबसे लंबी यात्रा स्मृतियों तक नहीं, बेटी के स्वभाव तक होती है। शायद इसी अनदेखे उत्तराधिकार को पहचानकर उसकी आँखें माँ के लिए भर आती हैं।
- आँसू, जो विरासत बन जाते हैं
जो महिलाएँ अपने बच्चों से अधिक अपनी माँ के लिए रोती हैं, वे प्रेम को तुलना में नहीं, पीढ़ियों की विरासत मानती हैं। उनके आँसू बताते हैं कि मातृत्व केवल एक स्त्री का नहीं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहती संवेदनाओं की धारा है। वे जान चुकी हैं कि माँ का ऋण चुकाया नहीं, केवल स्वीकार किया जाता है। इसलिए उनके आँसू दुःख नहीं, कृतज्ञता की मौन भाषा हैं, जो शब्दों से अधिक सच्ची है।
माँ बन जाने के बाद स्त्री के भीतर केवल ममता नहीं बढ़ती, कृतज्ञता भी जन्म लेती है। तभी उसे समझ आता है कि उसकी माँ ने उसे केवल पाला नहीं था, बल्कि अपने जीवन को चुपचाप उसके भविष्य में बदल दिया था। यही समझ एक दिन उसकी आँखों को नम कर देती है। उस समय वह अपने बच्चों से कम प्रेम नहीं कर रही होती, बल्कि उस प्रेम के मूल स्रोत को पहचान रही होती है, जहाँ से उसकी अपनी ममता ने जन्म लिया। सच तो यह है कि माँ के लिए बहाए गए आँसू किसी रिश्ते का अंत नहीं, बल्कि उस बेटी के परिपक्व हो जाने का प्रमाण हैं, जो आखिरकार अपनी माँ के प्रेम का अर्थ समझ चुकी होती है।
— कृति आरके जैन
