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भावनाओं का ज्वार, मौसम की फुहार, उत्सव और त्यौहार- अंतस् का सातवें वर्ष में प्रवेश

‘आतंकी हमलों ने जब-तब विष फैलाया है/ भारत की सेना ने शंकर-रूप दिखाया है’ अंतस्-अध्यक्ष, संयोजक-संचालक-पूनम माटिया की इन पंक्तियों तथा प्रसिद्द कवयित्री मुख्य अतिथि वंदना कुंअर रायज़ादा की, ‘करने हैं हमको दुश्मन के इरादे चकनाचूर… ऑपरेशन सिन्दूर’ पंक्तियों ने अंतस् की 72वीं मासिक काव्य-गोष्ठी को ‘सिन्दूरी’ रंग दे दिया

वहीँ दोहों के माध्यम से रस और रंग भरते हुए विशिष्ट अतिथि मनोज कामदेव ने अपनी पुस्तक ‘एक लिफ़ाफ़ा धूप से शीर्षक दोहा पढ़ा- ‘सूरज ने पाती लिखी, देख रात का रूप/ खिड़की खुलते ही गिरी, एक लिफ़ाफ़ा धूप’ तथा मनोज अबोध(सान्निध्य) ने आज के सामाजिक परिदृश्य को सामने रखते हुए कहा, ‘सावन कब आया गया, हुआ नहीं आभास/ बिन आँगन के फ्लैट में, बस ए सी की आस’.
राजेंद्र राज, छोटीकाशी अनूपशहर की अध्यक्षता में अबाध रस-वृष्टि हुई. सरस गीत और मुक्तक से श्रोताओं को मोहा, ‘अब हमारी तुम्हारी मुलाकात का/ आम चर्चा बना है बिना बात का’. पूजा श्रीवास्तव ने मधुर कंठ में वाणी-वंदना से आरम्भ किया, ‘करती हो तुम हंस सवारी/ चन्द्र-बदन मुख मोहे माँ!’ और फिर शानदार अशआर पढ़े, ‘लगे सूद में जिसकी सारी कमाई / चुकाएगा कैसे उधारी, न पूछो’. ग़ज़ल और माहियों से रंग जमाया रूबी मोहंती ने ‘सावन तो बहाना है/मिलना सखियों से/ बाबुल घर जाना है.’ पूनम माटिया ने जब वियोग शृंगार के गीत, ‘फागुन बीता, बीत गया आषाढ़ कि आया सावन/ कब आओगे, कब आओगे साजन?’ से समां बाँधा तो हाइकुकार डॉ नीलम वर्मा ने सावन के मौसम का चित्र प्रस्तुत करते हुए पढ़ा, ‘नील नभ पर/ रूई जैसे बादल/ तैर रहे हैं!’
डी पी सिंह, ‘मानो सखियों के झूलों में अम्बर छूने की जगी चाह’ के माध्यम से बरसात और सावन के विभिन्न रंग प्रस्तुत किये. प्रज्ञा श्रीवास्तव ने हास्य रचना, दुर्गेश अवस्थी ने छंदों के माध्यम से अपनी हाज़िरी लगाई. डॉ सरिता गर्ग और डॉ मंजू गुप्ता ने भाव-प्रवण रचनाएं प्रस्तुत कीं. अंतस् संरक्षक, नरेश माटिया के साथ कँवल कोहली जी की त्वरित प्रतिक्रियाओं तथा अन्यान्य सुधि श्रोताओं से अंतस् की गोष्ठी उत्साह-पूर्ण रही.

डॉ. पूनम माटिया

डॉ. पूनम माटिया दिलशाद गार्डन , दिल्ली https://www.facebook.com/poonam.matia poonam.matia@gmail.com