लघु उपन्यास : रघुवंशी भरत (कड़ी 11)
गुरु वशिष्ठ जी की बात का उत्तर देकर भरत जी ने सुमन्त्र जी से कहा- “सुमन्त्र जी! आप शीघ्र जाइए और मेरी आज्ञा से सेना सहित सभी को वन में चलने का आदेश सूचित कर दीजिए।” यह आदेश पाकर सुमन्त्र जी ने तुरन्त जाकर सबको वैसा ही आदेश सुना दिया।
शीघ्र ही नगर भर में यह समाचार फैल गया कि श्री राम को लौटा लाने के लिए भरत जी सेना सहित वन को जायेंगे। इससे सभी प्रजाजनों और सैनिकों को बहुत हर्ष हुआ। घर-घर में स्त्रियाँ अपने पतियों को शीघ्र तैयार होने के लिए प्रेरित करने लगीं। उनमें से जिनके पास अपने वाहन थे, वे प्रसन्नतापूर्वक वन को चलने के लिए तैयार हो गये। शेष लोगों ने अयोध्या में ही रुककर श्री राम की प्रतीक्षा करने और उनका स्वागत करने की तैयारी करने का निश्चय किया।
राजभवन में जैसे ही यह सूचना पहुँची कि भरत जी श्री राम को लौटा लाने के लिए वन को जायेंगे, वैसे ही सभी का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। वे महाराज दशरथ के दिवंगत होने का शोक भूल गये और श्री राम को पुनः पाने की आशा से हर्षित हो गये। वे हर्षपूर्वक भरत जी के साथ चलने की तैयारियाँ करने लगे।
जब यह समाचार रानी कैकेयी को मिला कि भरत जी श्री राम को लौटाकर लाने के लिए वन को जाने का निश्चय कर चुके हैं, तो वह गहन सोच-विचार में पड़ गयी। भरत जी उसकी सभी आशाओं को धूल में मिलाये दे रहे थे। पहला झटका उसको तब लगा था, जब भरत जी ने अयोध्या का राज्य ग्रहण करना स्पष्ट अस्वीकार कर दिया था। यही नहीं, उन्होंने सभी अप्रिय घटनाओं के लिए अपनी माता को दोषी मानकर उनको त्याग भी दिया था।
उस समय कैकेयी ने सोचा था कि अपने पिता महाराज दशरथ के निधन के कारण भरत जी ने ऐसी प्रतिक्रिया दी है और जैसे ही इसका शोक कम हो जाएगा, वैसे ही वे राज्य ग्रहण करने के लिए तैयार हो जायेंगे। इसी आशा में उसने भरत जी पर अधिक दबाव नहीं डाला और सभी की तरह महाराज की अन्त्येष्टि, एकादशी, त्रयोदशी आदि संस्कारों में भी भाग लिया, जैसा कि किसी भी विघवा महिला को करना आवश्यक होता है।
लेकिन जब त्रयोदशी संस्कार सम्पन्न हो जाने के बाद भी भरत जी ने राज्य ग्रहण नहीं किया और श्री राम को वन से लौटा लाने का निश्चय कर लिया, तो कैकेयी की सभी आशाओं पर तुषारापात हो गया। अब उसे अपनी भावी भूमिका पर विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। बहुत विचार करने के बाद उसे अपने कार्य पर लज्जा आने लगी और अपनी गलती का पश्चाताप होने लगा। उसने निश्चय किया कि अब वह हमेशा वही करेगी, जो भरत जी कहेंगे और वह उनके साथ पूरा सहयोग करेगी। यह निश्चय करने के बाद वह भी भरत जी के साथ वन को चलने के लिए तैयार हो गयी। उसने अपनी सेविकाओं को आवश्यक तैयारी करने का निर्देश दे दिया।
अगले दिन प्रातःकाल होते ही भरत जी और शत्रुघ्न जी एक उत्तम रथ पर सवार हुए और चल दिये। उनके आगे-आगे सभी मंत्री और पुरोहित भी रथों पर चल रहे थे। उनके पीछे चतुरंगिणी सेना चल रही थी। उन्होंने आधी सेना को अपने साथ रखा था और शेष सेना को अयोध्या की रक्षा के लिए वहीं रहने दिया था और उन्हें सदा सतर्क रहने का निर्देश भी दे दिया था।
तीनों माताएँ – कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी – भी रथों पर सवार होकर श्री राम को लौटा लाने के लिए उनके साथ चल रही थीं। कैकेयी को भी इस यात्रा में सम्मिलित देखकर सभी को आश्चर्य हुआ, लेकिन किसी ने भी इस पर कोई टिप्पणी नहीं की। किसी ने भी रानी कैकेयी को सबके साथ चलने के लिए बाध्य नहीं किया था, बल्कि वे स्वेच्छा से जा रही थीं। इससे सबने यही समझा कि भरत जी द्वारा उनकी भर्त्सना करने और राजा पद स्वीकार न करने से उन्हें अपनी गलती का भान हो गया है, उसी को सुधारने के लिए वे श्री राम को लौटा लाने के लिए भरत जी के साथ जा रही हैं।
भरत जी के साथ ब्राह्मणों सहित सभी वर्णों के नागरिक भी अत्यंत हर्ष के साथ श्री राम के दर्शन करने और उनको लौटाकर लाने के लिए चल रहे थे। सबने सुन्दर वेश धारण कर रखे थे और वे नाना प्रकार के वाहनों पर भरत जी के पीछे-पीछे चल रहे थे।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 8, सं. 2082 वि. (1 अगस्त, 2025)
