ग़ज़ल
कितने हसीन हैं ये संवारे बग़ैर भी,
कुछ लोग आ गऐ हैं पुकारे बग़ैर भी।
इक दूसरे भी रंग को उसने चढ़ा लिया,
ये पहला रंग ख़ुद से उतारे बग़ैर भी।
डोली नहीं कि अर्थी को भी कांधा चाहिए,
कटती नहीं हयात सहारे बग़ैर भी।
उसने जो मुझको देखा तो मैं भी न रह सकी,
दरपन में आज ख़ुद को निहारे बग़ैर भी।
इस पर हैं उसके ख़ून के क़तरे लगे हुए,
ये वर्दी जच रही है सितारे बग़ैर भी।
पैसा तो उसको भेजा है परदेस से मगर,
मुफ़़लिस वो हो गई है तुम्हारे बग़ैर भी।
झीलों में इसका अक्स नज़र आ रहा है अब,
ये चांद नीचे उतरा उतारे बग़ैर भी।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
