ग़ज़ल
ये बच्चे शाम को भी सताते ज़रूर हैं,
जलते हुए चराग़ बुझाते ज़रूर हैं।
होली गुज़रने पर भी इन्हें चैन नहीं है,
तहवार देर तक ये मनाते ज़रूर हैं।
राधा की चाची को कभी जुम्मन की ताई को,
ये घर के राज़ सबको बताते ज़रूर हैं।
बच्चों को नंगा रहने में आनन्द आता है,
कपड़ों को जिस्म से ये हटाते ज़रूर हैं।
बल्बों का टिमटिमाना भी इनको अज़ीज़ है,
बिजली का तार बच्चे हिलाते ज़रूर हैं।
मुश्किल से घर की इनपे कोई फ़र्क़ नहीं है,
मनचाही अपनी चीज़ मंगाते ज़रूर हैं।
जब इम्तिहां के वास्ते हम पढ़ रहे हैं तब,
ये बच्चे घर में शोर मचाते ज़रूर हैं।
— अरुण शर्मा साहिबाबादी
