झूठ और सच
सच क्या है झूठ क्या, कौन कहेगा,
राम का अस्तित्व नही, कौन सहेगा?
तुष्टिकरण के खेल में, धर्म बिसराते,
झूठ को सच देश में, कौन कहेगा?
झूठ हो सच साबित, परीभाषायें गढ़ी,
राम सेतु भी काल्पनिक, गाथायें गढ़ी।
सत्ता की खातिर, राम राम गाते घूमते,
राम से सिंहासन मिले, अभिलाषायें गढ़ी।
सूर्य पूरब से उदित, यह सत्य है,
रंग सूरज का भगवा, यह सत्य है।
भगवा आतंक की परिभाषा गढ़,
झूठ का प्रचार किया, यह सत्य है।
आज भी लिप्त हैं कुछ, इस खेल में,
सत्य पर झूठ का लेपन, इस खेल में।
नित नई परिभाषायें, झूठ की गढ़ रहे,
सत्ता के लालची व्यस्त, इस खेल में।
जो तुष्टिकरण का खेल खेलते, देश में,
जो मुस्लिमों का संरक्षक बनते, देश में।
राम कृष्ण के अस्तित्व को झूठा बताते,
ब्राह्मण सम्मेलन करते घूमते हैं, देश में।
भगवा आतंक कहने वाले, बेनकाब हो गये,
सनातन के विरोधी फिर से बेनक़ाब हो गये।
साजिशें रचने वाले, ख़ुद साज़िशों में फँस गये,
सत्य पर साज़िशों के पहरे, बेनक़ाब हो गये।
— अ कीर्तिवर्द्धन
