पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा
पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल सभी का जाने हैं,
जब तक डाली से जुड़े थे छाँव सरीखे माने हैं।
अब जो छूटे समय के झोंके दिशा-बिहीन हुए,
साँझ-सहर की बातें भी तो हो गये हैं धुएँ ।
मौन खड़ा हर वृन्त बताए कैसे टूटे ताने हैं।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है।
चलते-चलते राहगीर ने शाखों को छू देखा,
कुछ बिखरी सी याद समेटी कुछ मौसम का लेखा।
जिन गलियों से हँसी गुज़री थी आज वहीं वीराने हैं।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है।
कहीं-कहीं कुछ कोपल फूटी मन में फिर विश्वास,
शायद कोई और ऋतु आए दे जाए संन्यास।
फिर से कोई गीत जगेगा जिसमें हरजाई गाने हैं।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है।
— सविता सिंह मीरा
