गीतिका/ग़ज़ल

वर्षा की बूँदें

रेशम – सी कोमल – कोमल हैं, वर्षा की बूँदें।
छूकर तो देखो, शीतल हैं,वर्षा की बूँदें।

खेल रहीं स्वच्छंद गली में, आँगन में, छत पर
नन्हीं बिटिया – सी चंचल हैं,वर्षा की बूँदें।

कहतीं बाहर आ जाओ. थोड़ा – सा भीगो भी
मचा रहीं मन में हलचल हैं, वर्षा की बूँदें।

प्यासी धरती अम्मा की वे प्यास बुझातीं हैं
हिला रहीं धानी आँचल हैं, वर्षा की बूँदें।

प्रेम से पौधों को सीचें, नहलातीं-धोतीं हैं
हर्ष मनातीं उछल – उछल हैं, वर्षा की बूँदें।

नाच रही हैं हवा साथ ही अल्हड़ – मस्ती में
बजा रहीं छम – छम पायल हैं. वर्षा की बूँदें।

सुहावना मौसम साथी, आकर्षित करता है
घनीभूत छाए बादल हैं,वर्षा की बूँदें।

गर्मी से अति त्रस्त प्रकृति, आकुल – व्याकुल सी थी
बना रहीं सुख से पागल हैं, वर्षा की बूँदें।

मोती जैसी मूल्यवान हैं, अंजलि में भर लें
जीवन का उज्ज्वलतम कल हैं, वर्षा की बूँदें।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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