नीतिगत सुधार जनहित का प्रमाण बने
देश में जब भी कोई निर्णय जनस्वास्थ्य से जुड़ा होता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए, किंतु आँख मूंदकर नहीं। सरकार द्वारा घोषित यह निर्णय कि 35 आवश्यक औषधियों की कीमतों में भारी कटौती की जा रही है, पहली दृष्टि में एक राहतकारी और जनहितकारी घोषणा प्रतीत होती है। खासकर तब जब देश में करोड़ों नागरिक मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मानसिक विकार, संक्रमण और थायरॉइड जैसी दीर्घकालिक बीमारियों से ग्रस्त हैं और महंगी दवाओं के कारण नियमित इलाज से वंचित रहते हैं।
इस निर्णय के अनुसार अब जिन 35 औषधियों की कीमतों में 10 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक की कमी की गई है, वे ‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ में शामिल हैं। इनमें हृदय की धड़कन नियंत्रित करने वाली औषधियां, रक्त में शर्करा की मात्रा नियंत्रित करने वाली गोलियां, मानसिक रोगों की औषधियां, संक्रमण के लिए उपयोगी औषधियां और थायरॉइड नियंत्रण की दवाएं शामिल हैं। सरकार ने यह भी कहा कि अब निजी अस्पतालों, फार्मेसी दुकानों और सरकारी संस्थानों को नई कीमतें प्रदर्शित करनी होंगी और इनका पालन सुनिश्चित करना होगा।
यह सब सुनने में जितना सकारात्मक लगता है, ज़मीनी हकीकत उतनी ही जटिल है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि औषधि बाजार केवल कीमतों का खेल नहीं है, बल्कि एक संगठित संरचना है जिसमें औषधि निर्माता कंपनियां, चिकित्सक, विक्रेता और उपभोक्ता — सभी किसी न किसी रूप में एक चक्र में बंधे हैं। इस चक्र में आम नागरिक सबसे कमजोर कड़ी है, क्योंकि उसके पास न तो जानकारी है और न ही विकल्प की शक्ति।
औषधि कंपनियों की रणनीति वर्षों से यह रही है कि वे मूल्य नियंत्रण सूची में शामिल दवाओं को या तो नए नाम से बेचती हैं, या उनके स्वरूप में मामूली अंतर लाकर उन्हें मूल्य नियंत्रण से बाहर कर देती हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी दवा की 500 मिलीग्राम की मात्रा सूचीबद्ध है, तो कंपनियां उसी दवा का 475 या 525 मिलीग्राम संस्करण निकाल देती हैं। इससे वे नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं और मनमानी कीमत वसूलती हैं। यह तकनीकी चूक नहीं, बल्कि जानबूझकर अपनाई गई व्यावसायिक रणनीति है।
दूसरा बड़ा संकट चिकित्सकों के पर्चे की प्रकृति है। देश के अधिकांश चिकित्सक दवाओं के रासायनिक नाम के बजाय ब्रांड नाम लिखते हैं। ब्रांड नाम उन औषधि कंपनियों के होते हैं जो चिकित्सकों के बीच प्रचार, सुविधा और लाभ के माध्यम से संबंध बनाती हैं। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई मरीज मधुमेह से पीड़ित है और चिकित्सक उसे मेटफॉर्मिन नहीं बल्कि उसका महंगा ब्रांड ‘ग्लायकोमेट’ लिख देता है, तो मरीज वही ब्रांड खरीदने को विवश होगा, भले ही उसके सस्ते विकल्प उपलब्ध क्यों न हों। इसका सीधा असर सरकार की मूल्य नियंत्रण नीति पर पड़ता है क्योंकि मरीज तक वह लाभ नहीं पहुँच पाता जो घोषित किया गया था।
तीसरी विफलता औषधि वितरण प्रणाली में है। खुदरा विक्रेता न तो नई कीमतों की जानकारी उपभोक्ताओं को देते हैं और न ही दुकानों पर कोई सूची प्रदर्शित करते हैं। सरकार ने आदेश दिया है कि नई दरें सभी विक्रेताओं को स्पष्ट रूप से दिखानी होंगी, लेकिन सच्चाई यह है कि देश के अधिकांश औषधि विक्रेताओं ने आज तक किसी भी सरकारी मूल्य नियंत्रण अधिसूचना को नहीं अपनाया है। यदि कोई मरीज मूल्य की जानकारी चाहता भी है, तो उसे भ्रमित कर अधिक कीमत वसूली जाती है।
अब ज़रा सोचिए कि यह सब ऐसे समय पर हो रहा है जब भारत में स्वास्थ्य पर व्यक्ति द्वारा किया गया खर्च प्रति वर्ष बढ़ता जा रहा है। लगभग 70 प्रतिशत भारतीय अपनी जेब से स्वास्थ्य व्यय करते हैं। इस स्थिति में केवल दवाओं की कीमत घटा देना पर्याप्त नहीं है। जब तक चिकित्सक, विक्रेता और उपभोक्ता — तीनों को एक साथ जागरूक और उत्तरदायी नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह निर्णय एक घोषणात्मक प्रयास ही बना रहेगा।
इस निर्णय को प्रभावी बनाने के लिए सरकार को सबसे पहले चिकित्सकों पर नियंत्रण स्थापित करना होगा। चिकित्सा शिक्षा में यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि चिकित्सक केवल रासायनिक नाम से पर्चा लिखें। इससे मरीज को विकल्प मिलेगा कि वह किस ब्रांड की दवा लेना चाहता है और वह सस्ता विकल्प चुन सकता है। इसके साथ ही सभी औषधि विक्रेताओं को बाध्य किया जाना चाहिए कि वे मरीज को उपलब्ध सभी ब्रांड और उनकी कीमतों की जानकारी दें, न कि केवल अधिक लाभ देने वाली दवाएं बेचें।
इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि सरकार एक पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था लागू करे जिसमें मरीज एक पोर्टल, मोबाइल या जन सुविधा केंद्र के माध्यम से देख सके कि जिस दवा की उसे ज़रूरत है उसकी अधिकतम खुदरा कीमत क्या है, कौन-कौन से ब्रांड उपलब्ध हैं, और कौन सा सस्ता है। इस प्रकार की डिजिटल पारदर्शिता से ही मूल्य नियंत्रण प्रभावी बनेगा।
एक और चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार ने इस निर्णय के माध्यम से केवल एक पहलू को छुआ है — मूल्य। जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को समग्रता में देखना आवश्यक है। मूल्य केवल एक पहलू है। जब तक सरकारी अस्पतालों में मुफ्त औषधियां पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं कराई जाएंगी, तब तक गरीब और मध्यमवर्गीय नागरिक को कोई विशेष राहत नहीं मिल पाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सरकारी अस्पतालों में 50 प्रतिशत से अधिक आवश्यक औषधियां अनुपलब्ध हैं। ऐसे में मरीज को मजबूरी में निजी दुकानों से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं, जहां वह मूल्य नियंत्रण का लाभ नहीं ले पाता।
अब ज़रा इस निर्णय के समय पर गौर कीजिए। अगस्त माह में जब यह घोषणा की गई, तब देश में कई राज्य चुनावों की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में यह निर्णय जनहित के बजाय राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर लिया गया प्रतीत होता है। यह एक प्रचारात्मक राजनीति का हिस्सा बनता है जिसमें सरकार दिखाती है कि वह जनता के हित में कार्य कर रही है, जबकि ज़मीनी सच्चाई इससे बहुत दूर है।
फिर भी यदि इसे एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जाए, तो यह केवल एक आरंभ है। इसे आगे बढ़ाने के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना की आवश्यकता है, जिसमें दवाओं की निगरानी, चिकित्सकीय नैतिकता, विक्रेताओं की पारदर्शिता और उपभोक्ता की जागरूकता को जोड़ना होगा।
सरकार यदि वास्तव में स्वास्थ्य सेवा को सुलभ बनाना चाहती है, तो उसे एक बहुस्तरीय रणनीति अपनानी होगी। इसमें सरकारी अस्पतालों को दवा वितरण का केंद्र बनाना, फार्मेसी शिक्षा को अनिवार्य करना, चिकित्सकों के प्रशिक्षण में नैतिक मूल्य जोड़ना, दवाओं के विज्ञापन और प्रचार-प्रसार को नियंत्रित करना और साथ ही निजी अस्पतालों में औषधियों की दरों पर नियंत्रण रखना शामिल होना चाहिए।
एक ऐसा देश जो विश्व की फार्मेसी कहलाता है, वहाँ स्वयं के नागरिकों को दवाएं खरीदने में कठिनाई हो, यह विडंबना नहीं बल्कि विफलता है। औषधि क्षेत्र में जितना तकनीकी विकास हुआ है, उतना ही व्यावसायिक नियंत्रण भी बढ़ा है। यदि इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो दवाएं जीवन रक्षक नहीं, जीवन खर्चक बन जाएंगी।
अंततः यही कहा जा सकता है कि 35 औषधियों की कीमतों में कटौती स्वागत योग्य निर्णय है, किंतु अधूरा है। जब तक इस निर्णय को स्वास्थ्य नीति के व्यापक ढांचे में नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक यह निर्णय समाचार पत्र की एक सुर्खी बनकर रह जाएगा। मूल्य नियंत्रण की असली सार्थकता तभी होगी जब देश का प्रत्येक नागरिक यह जान सके कि उसे क्या, क्यों और किस कीमत पर मिल रहा है — और उसके पास विकल्प हो, निर्णय की स्वतंत्रता हो और व्यवस्था का सहयोग हो।
यही वह स्थिति होगी जब यह कहा जा सकेगा कि सरकार ने केवल घोषणा नहीं की, बल्कि जनस्वास्थ्य के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन भी किया है। तभी भारत स्वास्थ्य राष्ट्र बनने की दिशा में सचमुच आगे बढ़ेगा।
— अवनीश कुमार गुप्ता
