उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 14)

भरत जी श्री राम के बारे में निषादराज गुह से अधिक से अधिक जान लेना चाहते थे कि वे वहाँ कैसे रहे और क्या किया। इसलिए शयन करने से पहले उन्होने गुह जी से पूछा- ”मित्र! उस दिन श्री राम कहाँ और कैसे सोये थे? उन्होंने क्या कहा था?“

गुह जी ने बताया- “श्री राम और सीता जी लक्ष्मण जी द्वारा भूमि पर बनायी गयी कुश की शय्या पर सोये थे और लक्ष्मण जी रातभर धनुष-बाण लेकर उनकी रक्षा करते रहे थे। मैं भी उनके साथ ही जागता रहा था। हम दोनों रात्रिभर बातें करते रहे थे।“

यह सुनकर भरत जी की जिज्ञासा बढ़ गयी। उन्होंने पूछा- ”भैया लक्ष्मण और आप में क्या बातें हुई थीं? यदि बताने योग्य हों, तो बताइए। मैं सुनने को बहुत उत्सुक हूँ।“

अब निषादराज ने लक्ष्मण जी के साथ हुए अपने वार्तालाप के बारे में विस्तार से बताया। गुह बोले- ”राजकुमार! मैंने लक्ष्मण जी से कहा था कि ‘हमने आपके लिए भी सुन्दर शैया तैयार कर दी है। आप इस पर सुखपूर्वक सोइए। हम रात्रिभर जागकर आपकी रक्षा करेंगे, क्योंकि हमारे लिए तो वन के कष्ट सहना प्रतिदिन की बात है, परन्तु आप तो सुख सुविधाओं में पले हैं, आपको इनसे अधिक कष्ट होगा।’
लेकिन लक्ष्मण जी ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा था कि ‘जब भैया श्री राम और भाभी जी भूमि पर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिए सुखदायक शैया पर शयन करना उचित नहीं होगा।’ इसलिए हम दोनों बैठकर बातें करते रहे।

लक्ष्मण जी इस बात से चिन्तित थे कि हमारे वियोग में महाराज दशरथ कहीं अपने प्राण तो नहीं छोड़ देंगे। महाराज ने श्री राम का राज्याभिषेक संस्कार करके उनको राजा बनाने का निश्चय किया था, उनका वह संकल्प अधूरा रह गया। इस कारण लक्ष्मण जी को आशका थी कि महाराज अपने प्राणों का ही त्याग कर देंगे। उनको भय था कि महाराज के प्राण त्यागने पर रानियाँ कौशल्या और सुमित्रा भी अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह पायेंगी। सम्भव है कि शत्रुघ्न का मुख देखकर माता सुमित्रा जीवित रह जायें, परन्तु बड़ी माता कौशल्या तो पति और पुत्र के वियोग में निश्चित ही प्राण त्याग देंगी।

लक्ष्मण जी को यह भी शंका थी कि वनवास की अवधि पूरी करके हम श्री राम के साथ सकुशल अयोध्या लौट भी पायेंगे या नहीं। इस प्रकार विलाप करते हुए लक्ष्मण जी की सारी रात जागते हुए ही बीती।
प्रातःकाल होने पर श्री राम और लक्ष्मण जी दोनों ने गंगा जी के तट पर वट के दूध से अपनी जटायें बनायीं। फिर वे गंगा जी के पार उतरकर चले गये। सिर पर जटा धारण करके वल्कल वस्त्र पहने हुए और धनुष-बाण धारण किये हुए श्री राम और लक्ष्मण जी बहुत शोभा पा रहे थे। फिर वे इधर-उधर देखते हुए सीता जी के साथ आगे ऋषि भरद्वाज के आश्रम की ओर चले गये।”

श्री राम और लक्ष्मण जी द्वारा जटाएँ बनाने की बात सुनकर भरत जी बहुत दुःखी हो गये और वे सोचने लगे कि जब श्री राम ने जटा धारण कर ली हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने ससार से संन्यास ले लिया है। इसलिए अब वे शायद ही अयोध्या लौटेंगे और उनको लौटाकर लाने की मेरी इच्छा पूरी नहीं हो पायेगी। यह सोचते हुए अत्यन्त शोक के कारण भरत जी को मूर्च्छा आ गयी। भरत जी को मूर्च्छित होते देखकर निकट बैठे गुह और शत्रुघ्न बहुत व्यथित हुए और रोने लगे। शत्रुघ्न जी ने भरत जी का सिर अपनी गोद में रख लिया और विलाप करने लगे।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 13, सं. 2082 वि. (7 अगस्त, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com