ग़ज़ल
तुझे देखने को तरस रहीं थीं आँखें।
बस तेरी याद में बरस रहीं थीं आँखें।।
याद आ रहा था वो गुजरा जमाना।
सब कहने को तरस रहीं थीं आँखें।।
अक्सर ही आतें हैं ख्वाब तेरे।
बसाकर उन्हें झुलस रहीं थीं आँखें।।
आंँसुओं का सैलाब है इन आंँखों में।
बरसने को बेबस रहीं थीं आँखें।।
अपने दिल में बसा कर तस्वीर तेरी।
बिना बात ही हंँस रहीं थीं आँखें।।
— प्रीती श्रीवास्तव
