कविता

थोड़ा-सा अपने लिए

हर सुबह किसी और के लिए जगते हैं,
हर शाम किसी और के लिए थकते हैं।
अपनी चाहतों को टालते-टालते,
कब उम्र की धूप ढलने लगे,
पता ही नहीं चलता…

ज़रा-सा ठहरो,
अपने दिल की भी सुनो।
खुद से भी कोई वादा करो,
कि एक दिन नहीं,
हर दिन में कुछ पल
अपने लिए ज़रूर रखोगे।

दुनिया के पीछे भागते-भागते,
हम खुद से ही दूर हो जाते हैं।
जो हंसना चाहते थे,
वो हंसी किसी को दिखाने में खो देते हैं।

ये ज़िंदगी —
किस मोड़ पर सांस थमा दे,
कोई नहीं जानता।
तो क्यों न जी लिया जाए
वो सपना,
जिसे कल पर टाल रखा है?

लोग कहते हैं —
“समय नहीं मिलता”
पर सच तो ये है कि
हम खुद को समय देना भूल जाते हैं।

आज से,
थोड़ा-सा अपने लिए भी जीना शुरू करो।
क्योंकि जब परदा गिरेगा,
तालियाँ तो बहुत मिलेंगी…
पर अफ़सोस भी होगा
कि मंच पर अपनी कहानी अधूरी छोड़ दी।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh