कविता

जवाब तो देना होगा

क्या हम कहीं थे?
या नहीं थे?
यदि थे तो तुम्हारे बनाए इतिहास में
हमारा वजूद कहां है?
यदि नहीं थे तो
आज हम इस भूमि पर कैसे?
तुम्हारा दौर है आज,
जैसा चाहो वैसा लिख लो इतिहास,
जिस तरह हमारी आधी संख्या
भटकते रहे वनों और जंगलों में,
होते हुए भी सम्पूर्ण के मालिक,
और जिस तरह से रही आधी संख्या
खाते रहे एक रोटी
जिसके मूल में रहे घास,
तो छोड़िए बकवास,
ऐसा न हो कि वक्त आने पर
हम दे दें तुम्हें सम्पूर्ण वनवास,
तुम्हारे चोर उचक्के भी बन गए
पेंशन खाने वाले स्वतंत्रता सेनानी,
भूल जाते हो किये गए बेइमानी,
और धूल फांके खाते रहे
हमारे वे सारे लोग जो
तन पर कपड़ा न होने पर भी
तन कर खड़े हो जाते थे
तृतीय आतताइयों के सम्मुख,
भूलकर अपना सम्मान व भूख,
व्यवस्था चलाते आए हो,
हमारा देश के प्रति योगदान
शत प्रतिशत दबाए हो,
जवाब तो देना ही होगा क्योंकि
सदा तुम्हारे सामने खड़ा होगा सवाल
क्या हम कहीं थे?
या नहीं थे?

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554