ग़ज़ल
किसी बात का खौफ नहीं हो सकता उन दीवानों को
आग लगाकर आए हों जो अपने सब अरमानों को
इश्क मुहब्बत करना बेशक लेकिन इतना ध्यान रहे
शमा हमेशा से ही जलाती आई है परवानों को
भूख, गरीबी, सन्नाटा, रुसवाई या तनहाई हो
सर आंखों पर रखा हमने घर आए मेहमानों को
पैसा पैसा करने वालो क्या तुमने कभी देखा है
घर न बन पाए जो ऐसे आलीशान मकानों को
जज़्बा जगा दे अक्ल सिखा दे थोड़ी भलमनसाई दे
अगर मसीहा है तो ज़िंदा कर मुर्दा इंसानों को
— भरत मल्होत्रा
