आत्मकथा

चेतना मेरा नाम, मेरे नाम के कई उपनाम

१८ अगस्त २०२५ का दिन सोमवार, सुबह का समय। बहुत दिनों से सोच रही थी लेकिन समयाभाव के कारण लिख नहीं पा रही थी, आज घर का कार्य समेटने के बाद तीन कमरे की बीच की लॉबी में कुर्सी खींच कर बैठी। घड़ी की ओर देखी तो दस बजकर चालीस मिनट हो रहा था एक बार सोची टीवी पर न्यूज़ देख लूँ, देश दुनिया में क्या हो रहा है, दूसरी तरफ मेरा हाथ टेबल पर पड़ा हुआ मोबाइल पर चला गया, टीवी चला कर उसकी आवाज को धीमी करके एक कॉल बड़े ताऊ जी की दूसरे नंबर की बेटी यानि दीदी को किया, उनका हाल – चाल लेने के बाद मोबाइल देखना शुरू कर दी, पहले व्हाट्सएप खोली फिर फेसबुक तुरंत जीमेल।

“जीमेल खोलते ही जय विजय पत्रिका के संपादक डॉ ० विजय कुमार सिंघल जी का ईमेल १८ अगस्त, सुबह के दस बजकर बारह मिनट पड़ा था।
जो इस तरह था –
आपका नाम “चेतना प्रकाश” से फिर “चेतना सिंह” हो गया? प्रकाश जी का क्या हुआ?”

देखते दिल मेरा बैठ गया। कुछ देर बाद में सोचने लगी ये तो मेरे शुभचिंतक हैं इनको प्रकाश की चिंता हो रही है। मैंने अपने कई उपनाम से रचनाएं संपादकों के पास भेजीं किसी के पास कहाँ इतना समय लेखक को जानने में। अब मुझे लगने लगा अपने उपनाम को लेकर मुझे स्पष्ट कर देना चाहिए। इसके तीन वर्ष पहले भी विजय जी ने मुझसे प्रश्न किया था प्रकाश कौन है?

इस प्रश्न की पहेली को भी सुलझाना चाहती हूँ। पहले मैं जय विजय पत्रिका के लिए चेतना सिंह ‘चितेरी ‘ के नाम से रचनाएंँ भेजती थी। जब मैँ २०२२ में चेतना प्रकाश चितेरी के नाम से जय विजय पत्रिका के लिए रचनाएंँ ईमेल की, तो एक संपादक के तौर उनका प्रश्न पूछना स्वाभाविक था।

तब मैंने इनको बताया था मेरे पति विद्या प्रकाश सिंह है ‘प्रकाश ‘ अपने नाम के आगे लिखती हूँ।

साल २०२४, एक दिन मेरे बेटा स्कूल से आया और कहने लगा – “मम्मा! मेरे दोस्त आपका साहित्यक नाम लेकर मुझे चिढ़ाते हैं वे लोग कहते हैं। कि तुम अपने नाम के आगे सिंह लिखते हो तो तुम्हारी मम्मा चेतना प्रकाश चितेरी क़्यों लिखती हैं? ‘

मैंने बेटे से कहा- ‘ वे सब अभी बारह साल के बच्चे हैं और तुम भी। बेटा तुम तो समझते हो। ‘

उसने मुँह बनाकर कहा – नहीं मम्मा! जैसे मैं और डैडी, दीदी नाम के आगे सिंह लिखते हैं और हम सब सिंह हैं भी, नाना- नानी, दादा – दादी सब सिंह परिवार हैं। मेरे दोस्त पूछते हैं ‘चितेरी ‘ कौन – सी जाति है?

मैंने कहा- बेटा ! अपने दोस्तों को बताओ चितेरी कोई जाति नहीं है एक शब्द है, या मैं स्कूल आकर उनको समझा देती हूँ।

उसने बोला – नहीं.. नहीं… मम्मा! आपको आने की जरूरत नहीं है।

मैंने कहा- ” ठीक है मैं नहीं आती हूंँ।’ लेकिन बेटा! जितना तुम चिढ़ोगे उतना सब तुम्हें चिढ़ाएंगे।
बेटा अभी रहने देते हैं बाद में देखती हूँ। “

उसने कहा- “ठीक है मम्मा! लेकिन मेरी बात मानो आप चेतना सिंह लिखो। “

(वैसे, मुझे अपने नाम के आगे जाति लिखना पसंद नहीं। क्योंकि हर जाति अपने जाति का समर्थन करती है और जातिवाद समाज को अनेक टुकडों में बाँटती है।ऐसा मेरा मानना है। इसे कोई अन्यथा न लें।)

साल २०२५ में, एक दिन सुबह समाचारपत्र पढ़ रही थी उसमें लिखा था। कि – ‘जाति जनगणना होनेवाला है। ‘

मैं सोचने लगी- “लेखक की भी कोई जाति होती है वे अपने उपनाम से जाने जाते हैं। मेरा जन्म क्षत्रिय कुल में, सन् १९८० वाराणसी में हुआ। माता -पिता ने बहुत सोच समझ कर मेरा नामकरण किया। मेरी माता जी (डॉ उर्मिला सिंह ) उस समय शोध कर रही थी शोध का विषय “जयशंकर प्रसाद की काव्य चेतना और उनका जीवन दर्शन ”, शोध करने के दौरान ही उन्होंने सोच रखा था कि मुझे बेटी होगी तो उसका नाम चेतना रखूँगी। ” प्राथमिक विद्यालय से लेकर महाविद्यालय तक, आगे विवाह के बाद भी चेतना के रुप में मैं जानी गई।

मैं उन दिनों की बात कर रही हूंँ जब मैं कक्षा नौवीं (१९९५ ई० )में थी तो मुझे सारिका नाम अच्छा लगने लगा था अच्छा लगने कि कारण कक्षा बारहवीं में पढ़ रही सारिका दीदी का स्वभाव था। वैसे इस अवस्था में कुछ स्थिर नहीं रहता है कल्पनाओं की दुनिया, उड़ान भरती हैं, आंँखों में बहुत से चित्र बनते हैं और बिगड़ते हैं। मन और विचार परिवर्तित होते रहते हैं स्वयं को तलाशते हुए आगे चलकर कक्षा दसवीं में प्रवेश की तो शिखा नाम अच्छा लगने लगा। यह नाम अच्छा लगने की वजह जयशंकर प्रसाद की ‘कामयनी ‘ थी। हर नोटबुक पर चेतना सिंह / शिखा सिंह लिखने लगी। एक दिन दसवीं कक्षा में गृह विज्ञान विषय की कॉपियांँ चेक हो रही थी। टेबल पर सब कॉपियांँ चेक करके रखी जा रही थी। जब मेरी कॉपी सर जी हाथ में लिए तो चारों तरफ से उसको ध्यान से देखें जब चेक कर लिए एक एक करके नाम बुलाते गये जिनका कार्य अच्छा होता उन्हें शाबाशी मिलती हम सभी के लिए यह शब्द किसी खजाने से कम न होता, जिनका कार्य पूरा न होता उन्हें डाँट पड़ती, डाँट खानेवाला सिर नीचे करके खड़ा रहता और हम सब सर जी के दृष्टि से बचते बचाते हुए इधर- उधर मुँह करके हँस लेते। उसी दिन सर मेरा नाम पुकारे, मैं गई चुपचाप टेबल के पास खड़ी हो गई। सर तेज से बोले – “भवानी यह क्या लिखी हो?” (सर जी सभी लड़कियों को भवानी नाम से पुकारते थे।)

फिर बोले- “तुम्हारा नाम चेतना है शिखा क्यों लिखी हो? नाम बदलना मत! तुम्हारा चेतना नाम बहुत अच्छा है और गृहकार्य भी बहुत अच्छा है।”

उस दिन मैं बहुत खुश थी सर जी मुझे तेज़ से नहीं डाँटे। बल्कि सर जी की बात सुनकर मन प्रसन्न हो गया, अपने बेंच पर आकर बैठ गई। पीछे से मेरी कॉपी मांँगी गई उन्हीं लडकियों में से एक लड़की की आवाज आई आज मैं घर ले जाऊँगी,कल कार्य पूरा करके दे दूंँगी। यह यादें,आदर्श इंटर कॉलेज की आज फिर तरोताज़ा हो गई।

साल 2018 में ‘ चितेरी ‘ शब्द अच्छा लगने लगा। मैंने कई रचनाएँ ‘ चेतना चितेरी ‘ के नाम से लिखी।
उसी वर्ष मैंने योर कोट ऐप पर ‘चेतना की कलम से, प्रयागराज नाम से अनगिनत विचार लिखे।

३० जून २०२२, दोपहर के समय अपने परिवार के सदस्यों को खाना परोस रही थीं, तभी गेट पर घंटी बजी मेरा यही इकलौता बेटा उस समय दस साल का दौड़ते हुए गेट के पास गया उसके पीछे मेरी दोनों बेटियांँ भी गईं।पन्द्रह वर्षीय बड़ी बेटी ने डाकिये से पीला लिफाफा लेकर कमरे भीतर आई।
मेरे पति ने कहा – ‘”बेटा ! लाओ! हमको दो। “

उसने कहा- ” डैडी इस पर मम्मा का नाम लिखा है।”

मैंने मेरी निगाह घडी पर गई उस समय दो बजकर सैंतीस मिनट हो रहा था। सब ने मिलकर लिफाफा खोला उसके अंदर से एक सुंदर पत्रिका जिसके कवर पृष्ठ पर काव्य – सृजन त्रैमासिक पत्रिका लिखा था। उसमें मेरी रचना प्रकाशित हुई थीं।

मेरे पति मुस्कुराए और मुझसे बोले – “अकेले-अकेले प्रकाशित हो रही हो हमें छोड़ दी हो।”

मेरे नाम को दो-तीन बार चेतना चितेरी कहकर पुकारे। ‘

मैंने उनसे बोला – ” मैं नाम जोड़ने का प्रयास की थीं लेकिन आपका नाम विद्या प्रकाश मेरा नाम चेतना बहुत बड़ा नाम हो जा रहा था।”

इसी दिन से मैं चेतनाप्रकाश ‘चितेरी’ नाम से कई रचनाएंँ लिखीं और प्रकाशित भी हुई कुछ ही महीने में मैं चेतना प्रकाश चितेरी लिखने लगी इस इस नाम से मेरी कई रचनाएंँ प्रकाशित हुई। कुछ समयावधि के बाद मुझे अपना नाम बहुत अच्छा लगने लगा।

“मन की वही स्थिति है मन और विचार सदैव एक जैसे नहीं रहते, मुझे साहित्यिक नाम बहुत अच्छे लगते हैं।”

मैं अपने बच्चों को अनगिनत नामों से पुकारती हूंँ नाम में क्या रखा है? लेकिन ऐसा नहीं है आजकल तो लोग नाम के लिए ही मरते हैं, और नाम होने के लिए कार्य करते हैं तो भला मैं कैसी पीछे रह सकती हूंँ। न चाहते हुए भी जाति का नाम लिखना होगा, पूछेंगे लोग दूसरों से चितेरी कौन सी जाती है? कुछ लोग पढ़े – लिखे समझ जाएंगे कुछ लोग पढ़ लिखकर भी अनपढ़ हो जाएंगे, पीठ पीछे कई तरह की बातें होती रहती हैं।

यह कोई नई बात नहीं है भाई! लेखकों से उनकी जाति धर्म मत पूछो ! एक लेखक हमेशा अपनी रचनाओं व उपनामों से जाना जाता है।

अरे क्यों न पूछे? वोट नहीं देना है क्या तुम्हें?
आत्मा से आवाज आई। किस-किस को सफाई दोगी, आरक्षण नहीं मिलेगा कम से कम लोगों को पता तो चले किस जाति से हो, अपना मत दे सकती हो। जाति जनगणना होने वाली है, सबके हित के लिए कार्य करना है। मन में ख्याली पुलाव पके, आगे देखती हूँ। कितना सबका ध्यान रखती हूँ या रख पाती हूँ।

इस साल २०२५, १५ मार्च को मैंने एक कविता लिखी जिसका शीर्षक ‘ गौरैया ‘ रखा। इस कविता में मैंने बहुत सोच विचार कर माता – पिता के दिया हुआ नाम चेतना सिंह के नाम से लिखी। मेरे पिताजी (श्री तिलकधारी सिंह) भी यही चाहते हैं मैं अपनी रचनाएंँ चेतना सिंह के नाम से लिखूँ अब चेतना सिंह के नाम से रचनाएंँ लिखने लगी हूंँ। सबकी खुशी में अपनी खुशी पर, ऐसा नहीं है मैं तो यही चाहती हूंँ।कि चेतना चितेरी / चेतना सिंह “चितेरी’ / चेतना प्रकाश ‘चितेरी ‘ / चेतना सिंह के नाम से अनेकों रचनाएंँ मांँ सरस्वती की कृपा से लिखूँ। बच्चे बड़े हो जाएंगे धीरे – धीरे समझ जाएंगे। पिता की इच्छा का मान रखना चाहिए। नामकरण माताजी ने किया लेकिन उनको मेरे उपनाम से कोई शिकायत नहीं हुई।

उपनाम बदलते रहें लेकिन मेरी अस्मिता एक ही रही – चेतना। ‘मैं चेतना हूँ ‘ —- बहुत पहले इस शीर्षक के नाम से रचना की हूँ। मेरी पहचान चेतना से है चेतना की रचना चेतना के नाम से जानी जाएगी और
मेरे अंतर्मन में चेतना सदैव विद्यमान रहेगी।

— चेतना सिंह, प्रयागराज

चेतना सिंह 'चितेरी'

मोबाइल नंबर _ 8005313636 पता_ A—2—130, बद्री हाउसिंग स्कीम न्यू मेंहदौरी कॉलोनी तेलियरगंज, प्रयागराज पिन कोड —211004