गीतिका – साथ हो बीवी अगर…
बॉस हो जब सामने तो, मुस्कुराना छोड़ दो।
साथ हो बीवी अगर, दूजी पटाना छोड़ दो।
हाथ में है योग्यता-डिग्री-हुनर तो क्या हुआ?
पैरवी – रिश्वत न हो, अर्जी लगाना छोड़ दो।
जा रहे, जाओ मगर, जाने से पहले, सोच लो,
सालियां-सलहज न हों,ससुराल जाना छोड़ दो।
पुस्तकों में है लिखी, जीवन की गुजरी दास्तां,
जिंदगी इक जंग है, पीछा छुड़ाना छोड़ दो।
जब तलक आजाद हो, उड़ते रहो.. उड़ते रहो,
फंस गए गर जाल में, तो फड़फड़ाना छोड़ दो।
सुर सुरा सुख सुंदरी,जो भी मिले,ले लो,मगर,
डालते हो वोट जब, धंधा पुराना छोड़ दो।
आदमी हो, आदमीयत को, निभाना चाहिए,
मजहबों के नाम पर, लड़ना-लड़ाना छोड़ दो।
मां-बहन-बेटी-बुआ, पत्नी-पड़ोसन- प्रेमिका,
पूज्य हैं हर रूप में, इनको सताना छोड़ दो।
प्रेमियों के भाग्य में, हरदम जुदाई ही लिखी,
प्यार करना जुर्म है,तो गुण गिनाना छोड़ दो।
पाक है नापाक, चीनी चोर, अमरीका गधा,
हिंद है अब आत्मनिर्भर, दुम हिलाना छोड़ दो।
काव्य के शुभ नाम पर,’अवधेश’ कविता ही पढ़ो,
ये लतीफे, चुटकुले, अश्लील गाना, छोड़ दो।
— डॉ. अवधेश कुमार अवध
