कविता

स्त्रियाँ दूध-सी होती हैं

कुछ स्त्रियाँ सचमुच दूध-सी होती हैं,
सफेद, कोमल, निर्मल और पवित्र।
कच्ची उम्र में यदि कोई भरमाए,
गलत पात्र की छाया पाए,
तो वे खट्टेपन में ढल जातीं,
दूध-सी पल में बिगड़ जातीं।

पर जब सही व्यक्ति का साथ मिले,
स्नेह की धीमी-सी आंच मिले,
तो पककर वे ऐसी मिठास बन जातीं,
जो जीवन भर अमिट रहती है,
जीवन में अमृत रस रचती है।

स्त्रियाँ उबलती भी हैं दूध की तरह,
पर यदि मन का सच्चा साथी
उनके उफान को समझ ले,
तो दो मीठे शब्दों से ही
वे शांत हो जाती हैं।

फिर वे अपना अस्तित्व घोल देती हैं—
दही बनकर स्वाद,
घी बनकर सुगंध,
माखन बनकर मिठास।

जीवन पथ पर कल-कल बहती,
छीर से नीर हो जाती हैं।
बन जाती हैं जीवन धारा,
जीवन भर का मधुर सहारा।

फिर कोई परिस्थिति, कोई कठिनाई
उन्हें बिगाड़ नहीं पाती।
क्योंकि जब स्त्री सही रूप में पकती है,
तो वह केवल घर ही नहीं,
पूरे जीवन को
स्वाद और सुगंध से भर देती है।

— प्रज्ञा पांडेय मनु

*प्रज्ञा पाण्डेय 'मनु'

वापी़, गुजरात