गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आज ही झोंके हवा के देख सहलाने लगे।
ये नज़ारे देख हमको आज बहलाने लगे।।

वो खुले मैदान थे दौड़ा जहाँ बचपन कभी।
ताल , सरवर, नद, मुहाने आज तरसाने लगे।।

तब भरी आँखें हमारी देख छोड़ा गाँव जब।
छूटते मंजर सभी खलिहान तड़पाने लगे।।

वो जहाँ लगती महफ़िलें थीं शमा जलती सदा।
याद करते हम अभी फिर से गुनगुनाने लगे।।

माँ – पिता को छोड़ने का सालता है ग़म अभी।
पर करें क्या जब गरीबी रोज़ टकराने लगे।।

प्यार की वो गंध उठती रोज़ मदमाती यहीं।
गाँव के किस्से पुराने याद जब आने लगे।

गाँव – शहरों की सभी बातें अलग होती रहें।
आज खेतों की महक ही साँस महकाने लगे।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’