ग़ज़ल
वक़्त चलता ही रहा चाल हमारा क्या है
किसने पूछा है कभी हाल हमारा क्या है
कैसे गुज़री है इधर और किधर गुज़री है
जो थे ग़ाफ़िल रहे ख़ुशहाल, हमारा क्या है
वो तो भरते ही रहे अपने ख़ज़ाने लेकिन
दिन ब दिन हम हुए कंगाल, हमारा क्या है
एक मछली की तरह फंसते गये सब ख़ुद ही
उसने फेंका है अगर जाल, हमारा क्या है
बस हमीं पर थी ये बंदिश, न क़दम हम रक्खें
उनकी सजती रही चौपाल, हमारा क्या है
— पूनम माटिया
