धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी

हमारा देश सदियों से धार्मिक और सांस्कृतिक सद्भावना का केंद्र रहा है।जहाँ पर यहाँ के जन-मानस में अपने धर्म के प्रति,अपने अराध्य और इष्ट देवता के प्रति सच्ची आस्था,विस्वास और श्रद्धा की झलक देखने को मिलती है। और यही झलक अन्य देशों से एक अलग पहचान कराती है।जहाँ पर अनेक धर्म जाति सम्प्रदाय,भाषा बोली में विविधता के होते हुए भी अनेकता में एकता देखने को मिलती है।और ऐसा प्यारा झलक तब देखने को मिलती है जब हमारे देश में कोई पर्व,जयंती,या कोई धार्मिक कार्यक्रम का आगमन हो या आयोजन हो।हम बात कर रहे हैं धर्मिक पर्व जयंती या कार्यक्रम की।जैसे कि गणेश चतुर्थी,नवरात्रि,रामनवमी,मकर संक्रांती पर्व आदि।भादो मास का आगमन हो चुका है,पूरा भारत देश गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाने के लिए आतुर, ललायित और उत्साहित नजर आ रहा है।इसके बाद आएगी नवरात्रि का पर्व,जिसमें पुरा देश माता दुर्गा के भक्ति भवना में रंग जाएगा।इस प्रकार से पूरे देश के हर कोने-कोने,चौक-चौराहों पर जम के तैयारियां हुई है।गणेश स्थापन के लिए नाना प्रकार के पंडाल,बनाये गये हैं।जहाँ पर पूरे नौ दिनों तक गणेशोत्सव का पर्व धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है।गणेश जी की पूजा पहले क्यों की जाती है-
हमारे धर्म ग्रंथों में यह कथा आती है कि-
माता पार्वती को एकबार सारे देवताओं ने मिलकर अमृत से बना हुआ एक दिव्य मोदक प्रदान किया।ऐसे दिव्य मोदक को देखकर माता पार्वती के दोनो पुत्र कार्तिकेय और गणेश जी उसे प्राप्त करने की इच्छा जागृत की।और फिर क्या था दोनो भाई उस दिव्य मोदक को मांगने लगे।तब माता पार्वती ने एक शर्त रख दी।दोनो भाइयों ने माता से पूछा क्या शर्त है माता श्री? तब माता ने उस दिव्य मोदक के महत्व का वर्णन करते हुए कहा-
“तुम दोनो धर्म का आचरण करते हुए श्रेष्ठता प्राप्त कर सारे तीर्थों की यात्रा करके जो पहले आएगा उसे ही यह मोदक मै प्रदान करूंगी।”
माता पार्वती की ऐसी बातें सुनकर बिना देरी किये कार्तिकेय जी अपने वाहन में बैठकर शुभ घड़ी में ही सारे तीर्थों में स्नान करके माता के समक्ष आ खड़ा हुआ। उधर गणेश जी का मुषक वाहन होने के कारण यात्रा करने में असफल रहे।तब गणेश जी उसी समय चतुराई दिखाते हुए झट से अपने माता-पिता की परिक्रमा कर लिए।और दोनो माता-पिता के पास जाकर खड़े हो गये।
इसको देखकर माता पार्वती प्रसन्न हो गई और
उन्होंने कहा कि-“समस्त तीर्थ स्थल में किया गया स्नान,सम्पूर्ण देवताओं को किया गया नमस्कार,और सभी यज्ञों का अनुष्ठान तथा सभी प्रकार के व्रत-साधना-अराधना,मंत्र-जाप,योग संयम-नियम का पालन ये सभी प्रकार के साधना माता-पिता के सेवा-पूजन के सोलहंवें अंश के बराबर भी नही होते।इसलिए यह गणेश सैकड़ों पुत्रों और सैकड़ों गणों से भी बढ़कर है। अतः यह मोदक मैं गणेश को ही अर्पण करती हूँ। माता-पिता की भक्ति के कारण ही इसकी प्रत्येक यज्ञ में सबसे पहले पूजा होगी।”
गणपति भगवान को प्रथम पूज्य स्थान क्यो मिला-
गणपति को प्रथम पूज्य स्थान क्यो मिला ?
क्योकि उन्होंने अपने माता-पिता को इतना सम्मान दिया कि उन्ही की परिक्रमा करके कह दिया कि- “माता श्री मैंने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर ली ।” यह दर्शाता है कि हमें भी अपने माता-पिता का सम्मान करना चाहिए।
भगवान गणेश की सबसे पहले पूजा-
भगवान गणेश की सबसे पहले पूजा की जाती है।
सब देवों में वो अग्रणीय हैं।इसीलिए उनकी पूजा
करने के बाद ही कोई भी शुभ कार्य आरम्भ किया जाता है।भगवान गणेश को विघ्न-विनाशक और बुद्धि के देवता के रूप में माना जाता है।इनकी पूजा मंगल कार्यों में सबसे पहले पूजा की जाती है ताकि
उनका आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
भगवान गणेश की महिमा-
भगवान गणेश के बड़े-बड़े कान हैं। आँखे छोटी- छोटी और पेट बड़ा है। यह सभी प्रतीक स्वरूप है।अर्थात कान हमेशा खुले रखो ताकि,दुनिया की बुराई, निंदा-चुगली से प्रभावित न हो सको। आँखे छोटी होने का अर्थ है कि संसार की ओर अपनी दृष्टि
को नही रखनी चाहिए,बल्कि भगवान की ओर दृष्टि रखनी चाहिए।
बड़ा पेट अर्थात लम्बोदर यह दर्शाता है कि दुनिया की बातें पेट में छुपा के रख लो,इसको किसी के सामने प्रकट न करो।और इस प्रकार भगवान को हृदय में बसाकर उसको ध्यान करो,उसकी स्तुति करो ताकि उसका आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
इस प्रकार से श्री गणेश जी की स्थापना कर पूजा आराधना करने से हमारे जीवन में सुख-शान्ति और समृद्धि प्राप्त होती है,सारी बिघ्न बाधाएं दूर हो जाती है।

— अशोक पटेल “आशु”

*अशोक पटेल 'आशु'

व्याख्याता-हिंदी मेघा धमतरी (छ ग) M-9827874578