सत्य की चीख
आप कितनों भी उतार लें
अपने अंदर बसी हुई खीझ,
गुंजा है और सदा
गूंजता रहेगा सत्य की चीख,
सत्य रुक सकता नहीं,
कभी भी छुप सकता नहीं,
लाख पर्दे डाल लो सत्य बाहर आएगा,
सबकी करतूत बताएगा,
हर स्कैम हर घोटाला खुद ही बता देता है
अपने होने की कहानी,
ये नहीं है परी कथा कि
सुनाये दादी,नानी,
अपने लेखों ग्रंथों में लिख लो कुछ भी
मगर औरों के निष्पक्ष लेखों को
नकार नहीं पाओगे,
सच झूठ की हाजमा खराब कर देता है
सुकून से डकार नहीं पाओगे,
जुल्म,अत्याचार,पाखंड चाहे कर लो कितने
चरित्रवान नहीं कहलाओगे,
संविधान सर्वोपरि है मानो या न मानो
मस्तिष्क इसी के आगे झुकाओगे,
ताकत की ठनक रहेगी जब तक
कर सकते हो भरपूर मनमानी,
गलत को गलत ही कहेंगे सब
नहीं कहेंगे बच्चों वाली नादानी,
रह लो रहना है जितना घमंड में,
डूबा लो डुबाना है जितना पाखंड में,
ये सब कोई ठौर नहीं पाएगा,
जब सच्ची शिक्षा का दौर आएगा,
अपराध अपराध ही रहेगा
मांग सकते हो माफी की भीख,
क्योंकि प्रचंड आवाज वाली होती है
सत्य की चीख, सत्य की चीख।
— राजेन्द्र लाहिरी
