बोया फसल ही उगता है
लौटकर पक तो नहीं रही बोई फसल,
उज्जड़ तो नहीं हो रही आज की नसल,
हमें देखना होगा हम क्या बो रहे हैं,
अपनी औलादों को क्या कुछ दे रहे हैं,
अगर देना ही है तो व्यवहार को प्राथमिकता दो,
महापुरुषों की बताई हुई उच्च नैतिकता दो,
समता,समानता,बंधुत्व का पाठ पढ़ाओ,
खुद निर्मल रह उसे भी निर्मल बनाओ,
पाखंड बोओगे तो पाखंड ही काटोगे,
बदजुबानी कर देश की एकता को बांटोगे,
त्वरित सफलता की चाह में,
जनता की बेवकूफी देख मत रहो उत्साह में,
पीड़ित जानवर भी सुरक्षात्मक कदम उठाता है,
अपने आप को जहां तक हो सके बचाता है,
आम आदमी को हमेशा मूर्ख मत मानो,
अक्ल एक दिन उसमें भी उगेगी जानो,
बरबादी की तपिश को विकास मत मानो,
एक मात्र तुम्ही हो देश आस मत जानो,
बड़े बड़े आए यहां पर तुर्रम खान,
वो भी नहीं बचा पाए
अपनी शानोशौकत से भरी जान,
ये शर्मनाक है कि देश पीछे जा रहा है,
बेवकूफी से भरी बीती बातें क्यों याद आ रहा है,
नैतिकता और शुचिता की राह पर
जितना जल्दी जा सकते हो जाओ,
वतन को नैतिकता से परिपूर्ण बनाओ।
— राजेन्द्र लाहिरी
