ठहरो पल-दो-पल
इतनी जल्दी क्या है साजन, ठहरो पल-दो-पल।
जनम-जनम के हम साथी हैं, बंधन अचल अटल।
एक – दूसरे के हम दोनों, सुख – दुःख के संबल।।
नया – नया परिणय है अपना, चलना सम्हल-सम्हल।
दिल पर रख लो थोड़ा काबू, क्यों होते बेकल?
ठहरो पल-दो-पल।
कच्ची कली न तोड़ो बरबस, पक जाने दो फल।
अभी खेलकर आता होगा, देवर चतुर चपल।।
ताड़ेगी यदि ननद कुंवारी, जाएं पांव फिसल।
छोड़ो भी अब बरजोरी से, बह जाए काजल।।
ठहरो पल-दो-पल।
हृदि-सितार ना छेड़ो असमय, नटखट उछल-उछल।
माना तुमको ही करना है, पावन प्रणय पहल।।
प्रीति रीति की नीति निभाओ, दिल में है हलचल।
उलझ गए केशों में कुंडल, पांवों में पायल।।
ठहरो पल-दो-पल।
व्रती सती नव परिणीता मैं, मधुमासी – कोयल।
अधर अनजुठे,निर्मल-निर्जल, कर दो इन्हें सजल।।
उखड़ी – उखड़ी सी सांसें ये, करतीं उथल-पुथल।
अंग – अंग में है अनंग, दिल, जाए मचल-मचल।।
ठहरो पल-दो-पल।
युग-युग से मरुथल-सी प्यासी, बरसो रे बादल।
सिंधु ज्वार सम हृदय उफनता, ज्यों नागिन घायल।।
प्रथम रात्रि के प्रथम मिलन पर, रच दें सजल ग़ज़ल।
खड़काने दो कुंडी – सांकल, हम दोनों पागल।।
ठहरो पल-दो-पल।
अंग लगा हर बंध खोल दो, खोलो बंद महल।
रोम – रोम को प्रेम ऊष्म से, कर दो रंगमहल।।
प्रीति – सरोवर ऐसा बांधों, ज्यों रिहंद – नांगल।
युगों-युगों तक जुड़े रहें ये, अधराधर चंचल।।
ठहरो पल-दो-पल।
परम-प्रीति में पगकर मानों, देह हुई संदल।
प्रेम रंग में रंगी राधिका, ओढ़ श्याम कंबल।।
द्वैत देह एकात्म हुई ज्यों, कस्तूरी परिमल।
अकथ अमर्त्य अखंड संग में, हम दोनों विह्वल।।
ठहरो पल-दो-पल।
संतति सुख से पूर्ण हुए, लड़ मल्लयुद्ध – दंगल।
जैसे मरुथल में उग आया हरा – भरा जंगल।।
मातृ लाभ से मैं विभोर ज्यों, तापस – गंगाजल।
हर नारी के जीवन में, पति- पुत्र रहें मंगल।।
ठहरो पल-दो-पल।
दूध पी रहा शिशु गोदी में, ढुलका है आंचल।
द्वार खोलकर आ मत जाना, ढीली है सांकल।।
हम दोनों मिलकर कर लेंगे, हर सवाल को हल।
सास – ससुर के शयन कक्ष में, रख आने दो जल।।
ठहरो पल-दो-पल।
हम जीवन- रथ के दो पहिये, रहते अगल – बगल।
सिया-राम सम अपना नाता, हम हैं अमर युगल।।
एक प्राण, दो देह, हमारे, जन्म – मृत्यु प्रतिफल।
रहे सलामत अपनी जोड़ी, अटल अकाट्य सफल।।
ठहरो पल-दो-पल।
— डॉ अवधेश कुमार अवध
