पंजाब की बाढ़
बरसात की बूंदें बरसीं बेइंतहा,
नदियाँ बनीं लहरों का कहर सदा।
खेतों की हरियाली डूब गई पानी में,
सपनों की फसल बह गई तूफ़ानी रवानी में।
गाँवों की गलियाँ नावों में बदलीं,
मकानों की दीवारें लहरों से ढलीं।
बचपन की किलकारियाँ भीगीं आँसुओं में,
माएँ ढूँढतीं छत, पिता भटकते सड़कों में।
क्या ये प्रकृति का प्रकोप है अकेला?
या इंसानों का लालच, जिसने राहें मोड़ा झरनों का झेला।
नदियों को बाँध कर किया कैद हमने,
और अब वही नदियाँ माँग रही हक़ अपने।
पंजाब की धरती पुकार रही आज,
“संतुलन बनाओ, करो प्रकृति का सम्मान।”
वरना हर साल ये मंजर लौटेगा,
हर सपनों का आँगन यूँ ही रोएगा।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
