गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मालूम है हाथों में हाथ कौन देता है।
मालूम है उमर भर साथ कौन देता है ।

हो जाते बंद दरवाजे सभी उसके लिए।
बोलो मुफ़लिस को इंसाफ कौन देता है।

है पतझड़ का मौसम भी हरा सदा उसे।
बेनूर पड़ी आंखों को ख्वाब कौन देता है।

ये शानो-शौकत यहीं रह जाती है धरी।
गिर जाए साख तो इज्जत कौन देता है।

साया हो सर पर तो आंचल में दुनिया है।
मां के विना विन मांगे ग्रास कौन देता है।

— सुदेश दीक्षित

सुदेश दीक्षित

बैजनाथ कांगडा हि प्र मो 9418291465