लघुकथा

रक्षाबंधन

निमिषा का हँसमुख स्वभाव सबको बहुत भाता था | हमेशा खुश रहने वाली निमिषा का मन सावन आते ही उदासी में तब्दील हो जाता |सावन के महीने में ही तो भैया विमल मंदिर से खो गया था|
दीदी ! भाई विमल को गए कई साल गुजर गए पर तुमअब तक राखी का थाल सजाती हो उसकी प्रतीक्षा में |
हाँ कीर्ति! मुझे अपने नेह के बंधन परअटूट विश्वास है | आज रक्षाबंधन है, इसलिए आओ द्वार को सजा दें हल्दी चंदन से लिख दें स्वागत है भइया |
राखी के थाल में दीपक जलाके दोनों घर के मंदिर की ऒर बढ़ती हैं तभी माँ बोल पड़ती है निमिषा क्यों याद दिलाकर रुलाती है |
रुंधे गले से माँ! भैया आएगा मुझे विश्वास है और निहारती है जलते दीपक की वर्तिका को | तभी बेल बजती है ट्रिन ट्रिन निमिषा मुड़कर देखती है बाहर विमल खड़ा मुस्कुरा रहा था |
— मंजूषा श्रीवास्तव

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016