रक्षाबंधन
निमिषा का हँसमुख स्वभाव सबको बहुत भाता था | हमेशा खुश रहने वाली निमिषा का मन सावन आते ही उदासी में तब्दील हो जाता |सावन के महीने में ही तो भैया विमल मंदिर से खो गया था|
दीदी ! भाई विमल को गए कई साल गुजर गए पर तुमअब तक राखी का थाल सजाती हो उसकी प्रतीक्षा में |
हाँ कीर्ति! मुझे अपने नेह के बंधन परअटूट विश्वास है | आज रक्षाबंधन है, इसलिए आओ द्वार को सजा दें हल्दी चंदन से लिख दें स्वागत है भइया |
राखी के थाल में दीपक जलाके दोनों घर के मंदिर की ऒर बढ़ती हैं तभी माँ बोल पड़ती है निमिषा क्यों याद दिलाकर रुलाती है |
रुंधे गले से माँ! भैया आएगा मुझे विश्वास है और निहारती है जलते दीपक की वर्तिका को | तभी बेल बजती है ट्रिन ट्रिन निमिषा मुड़कर देखती है बाहर विमल खड़ा मुस्कुरा रहा था |
— मंजूषा श्रीवास्तव
