खाद्य संयम
हमारे जीवन में रोटी का प्रश्न पहला प्रश्न हैं । यह पहला प्रश्न है इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न हैं । वह कोई भी मनुष्य खायें बिना नहीं जी सकता है और जब जी नहीं सकता है तब कुछ भी नहीं कर सकता हैं । हमको कुछ भी करने के लिए जीवन जरूरी हैं और जीवन के लिए रोटी जरूरी है । संयम स्रष्टि का आदि हैं । यह जड़ और चेतन दोनों की सुरक्षा का मूलभूत आधार हैं ।वह जड़ पदार्थों का खुला प्रयोग जैसे भौतिक जगत के विनाश की कहानी गढ़ता हैं वैसे ही असंयम मानव – जाति के लिए भारी विनाश का कारण बनता हैं । वह सम्पूर्ण स्रष्टि में अमन चैन का एक मात्र साधन संयम हैं । वह इसी संयम के कारण सामाजिक, पारिवारिक तथा विविध संगठन आदि – आदि खड़े होते हैं । हमारे इस शरीर का गठन भी किसी विशेष संयम के कारण सुरक्षित रह सका है । वह खाने पीने का संयम हैं ।हर व्यक्ति एक सीमा तक खाने पीने का संयम रखता है भले ही फिर वह रोग के डर से हों, सौन्दर्य नष्ट होने के भय से हों तथा मेरे भोग छूट न जायें इस कारण से हों आदि – आदि । यह सहज जीवन की व्यवस्था हैं ।जैसे कपड़े का कारण धागा और धागे का कारण पक्ष्म ( रोम ) हैं, वैसे ही मोक्ष का कारण ज्ञान, दर्शन और आचारमय जीवन हैं और जीवन का कारण आहार हैं ।वह आहार के बिना जीवन नहीं हो सकता तथा जीवन के बिना ज्ञान, दर्शन और आचार की आराधना नहीं हो सकती और उसके बिना बंधन – मुक्ति नहीं हो सकती हैं ।इसका तात्पर्य यह हैं कि मनुष्य की पहली चिंता और पहली अपेक्षा आहार हैं ।अतः हमारे द्वारा आहार के प्रश्न को गौंण नहीं किया जा सकता हैं और इसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती हैं । साधना के लिए स्वास्थ्य जरूरी हैं और स्वास्थ्य के लिए आहार जरूरी हैं । वह सभी का सही से संतुलन होने पर हम अनेक शक्तियों को जागृत करने में सफल हों सकते हैं ।
— प्रदीप छाजेड़
