ग़ज़ल
रेगिस्तान में पानी लाया जा सकता है
वीराने में कमल खिलाया जा सकता है
समझदार को समझाना नामुमकिन है
अहमक को फिर भी समझाया जा सकता है
अभी भी थोड़ी जगह बची है सीने में
ज़ख्म और एक आधा खाया जा सकता है
क्यों खींचें शमशीरें जब कि हर मसला
बातचीत से भी सुलझाया जा सकता है
मेरी ग़ज़लें तो चोरी कर सकते हो
हुनर मगर किस तरह चुराया जा सकता है
— भरत मल्होत्रा
