ग़ज़ल
ये कौन बक रहा है?
ये क्या-क्या कह रहा है
किसी की समझ न आता
खुद भी न समझ रहा है
नहीं उसका अर्थ कोई
जो मुँह से निकल रहा है
अपने पापों पर पर्दा डाले
दूसरों को तक रहा है
बेवक़ूफ़ियों पर इसकी
हर शख़्स हँस रहा है
चमचे वाह वाह करते
इस पर ही उछल रहा है
पता इसको कुछ नहीं है
निपट ‘अंजान’ लग रहा है।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
