ग़ज़ल
कह रहा बार-बार दिल लाओ
हुस्न लेकर कटार दिल लाओ
कह रहे वो यही ज़माने से
मैं करूँगा न प्यार दिल लाओ
है कहाँ वो उजाड़ जंगल-सा
मैं बसा दूँ बहार दिल लाओ
जब रखा दिल जवाब पाया ये
क्यों मलिन है निखार दिल लाओ
आज फ़रमान इक नया आया
चाँद पर क्यों उतार दिल लाओ
इम्तहां प्यार का इसे मानो
आतिशों से गुज़ार दिल लाओ
पाँव में आबले पड़ें तो क्या
पारकर रेगज़ार दिल लाओ
— केशव शरण
