लघुकथा

मैं मन से तैयार हूँ

आज उमेश एक डॉक्टर बनकर प्रसिद्धि पा रहा है, लेकिन यहाँ तक पहुंचा कैसे अक्सर वह याद करता!
उमेश इंजीनियरिंग करना चाहता था, उसकी मम्मी डॉक्टरी की लाइन में जाने को मजबूर कर रही थी. पापा चुप्पी साधे थे.
“तुम इंजीनियरिंग के लिए इतनी कोचिंग ले रहे हो, मेरी एक बात मानोगे?” एक दिन उन्होंने मोर्चा संभाला.
“मानने लायक होगी तो अवश्य मानूंगा.”
“तुम्हारी मम्मी तुम्हारी काबिलियत को देखते हुए तुम्हें डॉक्टरी की लाइन पकड़ने को कह रही है. मेरी मानो तो डॉक्टरी के लिए कुछ भी पढ़ाई मत करो, बस एक बार टेस्ट दे दो, उसके बाद जो करना चाहते हो करो.”
“ठीक है.” कहकर उसने टेस्ट दिया, उसका परिणाम देखकर वह खुद हैरान हो गया.
“मेरे दोस्त 3-4 बार टेस्ट देते हैं और पास नहीं हो पाते, मेरी तो इतनी अच्छी रैंक आई है मम्मी-पापा, मैं डॉक्टरी करूंगा.” उमेश ने मम्मी-पापा का धन्यवाद करते हुए कहा.
“अपने ऊपर रोडरोलर धकेलने जैसा बोझ समझकर तो ‘हाँ’ नहीं कह रहे हो?” पापा उसकी स्वतंत्रता पर पाबंदी नहीं लगाना चाहते थे.
“नहीं, मैं मन से तैयार हूँ और वही करूंगा!”
अब वह सफलतापूर्वक मानसिक रोगियों का इलाज कर रहा है.

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244